अन्नदाता कर रहे हैं आत्महत्या


राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आकंडों के अनुसार भारत भर में 2009 के दौरान 17368 किसानों ने आत्महत्या की है।किसानों के हालात बुरे हुए हैं, इस बात का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि किसानों की आत्महत्या की ये घटनाएँ, 2008 के मुकाबले 1172 ज़्यादा है। इससे पहले 2008 में 16196 किसानों ने आत्महत्या की थी।जिन राज्यों में किसानों की स्थिति सबसे ज़्यादा खराब है उनमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ सबसे आगे हैं.किसानों की आत्महत्या की कुल घटनाओं में से 10765 यानी 62 प्रतिशत आत्महत्याएँ इन पाँच राज्यों में ही हुई है.

तमिलनाडु में हालात बदतर

इन पाँच राज्यों के अलावा सबसे बुरी ख़बर तमिलनाडु से है. वर्ष 2009 में यहाँ दोगुने किसानों ने आत्महत्या की. वर्ष 2008 में यहाँ 512 किसानों ने आत्महत्याएँ कीं जो वर्ष 2009 में 1060 पर जा पहुँची. पिछले दस वर्षों से किसान आत्महत्याओं के आंकड़ो में अव्वल रहने के लिए बदनाम महाराष्ट्र 2009 में भी सबसे आगे रहा, हालांकि यहाँ आत्महत्या की घटनाओं में कमी आई है. महाराष्ट्र में 2009 के दौरान 2872 किसानों ने आत्महत्या की जो कि 2008 के मुकाबले 930 कम है. इसके बाद कर्नाटक में सबसे ज़्यादा 2282 किसानों ने आत्महत्याएँ की. केन्द्रशासित प्रदेशों में पॉन्डिचेरी में सबसे ज्यादा 154 किसानों ने आत्महत्या की. पश्चिम बंगाल में 1054, राजस्थान में 851, उत्तर प्रदेश में 656, गुजरात में 588 और हरियाणा में 230 किसानों ने आत्महत्या की.

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आकंडों के अनुसार 1997 से 2009 तक भारत में दो लाख 16 हज़ार 500 किसान आत्महत्या कर चुके हैं।कुल 28 राज्यों में से 18 राज्यों में किसान आत्महत्याओं की संख्या में इज़ाफा हुआ है।जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड में किसान आत्महत्याओं में ना के बराबर इज़ाफ़ा हुआ है.

बनारस में ब्लास्ट...

मंगलवार की शाम साढ़े छह बजे गंगा आरती स्थल शीतला घाट जबरदस्त बम विस्फोट से दहल गया। इस बम विस्फोट में लगभग दो दर्जन लोग घायल हुए हैं, जबकि अस्पताल में उपचार के दौरान एक बच्ची की मौत हो गई। घायलों में आधा दर्जन विदेशी नागरिकों के होने की सूचना है। मंडलीय अस्पताल पहुंचे 13 घायलों में से इटली के एक नागरिक को गंभीर स्थिति में बीएचयू के सर सुंदरलाल अस्पताल रेफर कर दिया गया। विस्फोट तब हुआ जब गंगा आरती चल रही थी। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि घाट की रेलिंग और सीढि़यों के पत्थर तक उखड़ गये।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार विस्फोट आरती स्थल से लगभग 20 मीटर दूरी पर हुआ। उस दौरान आरती देखने के लिए मौके पर हजारों लोग जमा थे। विस्फोट की चपेट में आने से आधा दर्जन वहीं लहूलुहान होकर गिर पड़े, जबकि दो दर्जन लोगों को गहरी चोट आयी। घाट समेत आसपास के इलाकों में भगदड़ मच गयी।

प्रारंभिक जानकारी के अनुसार बम दूध के कंटेनर में रखा गया था। छह दिसंबर के अगले दिन हुए इस धमाके को पूर्व नियोजित माना जा रहा है। अयोध्या के विवादित ढांचा ध्वंस की बरसी का दिन सुकून से गुजरा था। पुलिस फोर्स थोड़ा बेफिक्र थी। इसका फायदा भी आतंकियों ने उठाया। पुलिस का अनुमान है कि बम को टाइमर सिस्टम से कंट्रोल किया गया था। इसमें आईईडी या आरडीएक्स के प्रयोग की संभावना को भी पुलिस खंगाल रही है। फिलहाल पूरे इलाके को अ‌र्द्ध सैनिक बलों के हवाले करने के बाद सील कर दिया गया है।

सूचना मिलते ही पुलिस व प्रशासन के आला अधिकारी मौके पहुंच गये। घायलों में इटली निवासी 52 वर्षीय मनतरली व सुल्तानपुर निवासी जरायू को कबीरचौरा स्थित मंडलीय अस्पताल पहुंचाया गया। शेष घायलों को विभिन्न अस्पतालों में ले जाया गया। इनमें टेढ़ी नीम निवासी एक वर्षीय बच्ची बेबी भी शामिल थी। उसकी नानी उसे लेकर गंगा आरती देखने गयी थी। इसी दौरान विस्फोट की जद में आकर बेबी घायल हो गयी। उपचार के लिए उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसने दम तोड़ दिया। उसकी 45 वर्षीय नानी उर्मिला भी गंभीर रूप से घायल है।

इस संबंध में सूचनाओं की जानकारी के लिए प्रशासनिक हेल्पलाइन नंबर है 05422502626, 0542100।

उधर, प्रतिबंधित आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन ने विभिन्न मीडिया प्रतिष्ठानों को ईमेल भेजकर वाराणसी बम विस्फोट की जिम्मेदारी ली। यह ईमेल मुंबई के मलाड से भेजा गया।

आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि पांच पृष्ठ के इस ई-मेल पर अल अरबी के हस्ताक्षर हैं जिसका इंटरनेट प्रोटोकाल पता मुंबई के उपनगरीय इलाके मलाड में निकला और पुलिस की टीमें तत्काल वहां पहुंचीं। इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी विस्फोटों के चंद मिनट के भीतर ई-मेल भेजने के लिए वाईफाई के कनेक्शनों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

गृहमंत्री ने कहा कि वाराणसी विस्फोट की जिम्मेदारी लेने के लिए इंडियन मुजाहिदीन द्वारा कथित तौर पर भेजे गए ईमेल की विश्वसनीयता की जांच की जा रही है। चिदंबरम ने कहा, वाराणसी में विस्फोट भटके हुए समूह द्वारा शांति और भाईचारे को बाधित करने की कोशिश है।

यह आतंकी हमला है : एडीजी

यूपी पुलिस को वाराणसी में हुए बम धमाके के पीछे आतंकवादियों का हाथ होने का संदेह है। सबसे ज्यादा शक इंडियन मुजाहिदीन पर है। अपर पुलिस महानिदेशक [कानून-व्यवस्था] बृजलाल ने मीडिया को बताया कि घटना में आतंकी हाथ होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। प्रथम दृष्टया शक की सुई इंडियन मुजाहिदीन पर जा रही है।

उन्होंने बताया कि घटना के मद्देनजर पूरे प्रदेश में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है। जिलों की पुलिस को सावधान किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि फिलहाल घटना में किसी के मरने की खबर नहीं है। सात लोगों के घायल होने की बात सामने आई है। इसमें एक विदेशी भी है। घायलों को अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है।

दूसरी ओर मुख्यमंत्री मायावती ने प्रमुख सचिव गृह कुंवर फतेह बहादुर तथा डीजीपी करमवीर सिंह को तत्काल वाराणसी पहुंचने का निर्देश दिया है। शाम साढ़े सात बजे दोनों अधिकारी राजकीय विमान से वाराणसी के लिए चल पड़े। उनके साथ सहकारिता मंत्री व बसपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य भी हैं।

एडीजी ने बताया कि घटना की सूचना पाकर वाराणसी रेंज के आईजी व अन्य अधिकारी मौके पर तत्काल पहुंच गये और राहत व बचाव कार्य में लग गये। अभी तक प्राप्त प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक बम एक बैग में रखा गया था और विस्फोट टाइमर के जरिये किया गया। उन्होंने कहा कि बम में किस प्रकार के विस्फोटक का प्रयोग किया गया यह जांच के बाद ही पता चलेगा।

भिखारी हो तो ऐसा ...

पेट भरने के लिए सड़कों पर भीख मांगने वाले भिखारी तो हर कहीं देखने को मिल जाते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में एक ऐसे भिखारी हैं जो भी

ख मांगकर जुटाए गए पैसों से गरीब और बेसहारा लड़कियों की शादी कराकर उनकी जिंदगी खुशहाल बना रहे हैं।
सोनभद्र जिले के निवासी रमाशंकर कुशवाहा (58) रामगढ़ कस्बे में स्थित शवि मंदिर के महंत हैं। पूरे इलाके में ये 'भिखारी बाबा' के नाम से मशहूर हैं। भिखारी बाबा अब तक करीब 600 गरीब आदिवासी व दलित कन्याओं का विवाह कराकर उनका घर बसवा चुके हैं।
भिखारी बाबा ने कहा, ''मुझे हर बेसहारा और गरीब कन्या में अपनी बेटी नजर आती है। मैं नहीं चाहता है कि धन के अभाव में किसी कन्या की डोली न उठ पाए। इसलिए शादी कराके उनका जीवन सुखमय बनाने के लिए मैं भीख मांगता हूं।''
लड़कियों की शादी में खर्च होने वाला धन जुटाने के लिए वह साल भर अपने शिष्यों के साथ घूम-घूम कर भीख मांगते हैं।
बाबा कहते हैं, ''हर महीने के करीब पंदह दिन मैं अपने शिष्यों के साथ सोनभद्र और आस-पास के जिलों में भीख मांगता हूं। फिर शादी के मुहूर्त वाले महीनों फरवरी से जून के बीच में कोई एक दिन निर्धारित करके लोगों की मदद से शवि मंदिर परिसर में विवाह समारोह आयोजित करता हूं।''
भिखारी बाबा भीख मांगकर पिछले 5 सालों से सोनभद्र और आस-पास के जिलों की गरीब आदिवासी और दलित लड़कियों की सामूहिक शादी कराते आ रहे हैं।
बाबा के जीवन में घटी एक मार्मिक घटना ने उन्हें इस काम को अंजाम देने के लिए प्रेरित किया। बाबा कहते हैं, ''साल 2005 में मेरे आश्रम के पास संतोष कुमार नाम का एक युवक आया और कुएं का पानी पीकर छाया में सुस्ताने लगा। तभी उसे अचानक दिल का दौरा पड़ गया और उसकी वहीं पर मौत हो गई। संतोष के घर में केवल उसकी एक छोटी बहन रीता थी। उसकी मौत की खबर पाकर वहां बदहवास हालत में वहां आई और रो-रोकर कहने लगी कि अब उसका क्या होगा..कौन उसकी देखभाल करेगा। उसे रोता बिलखता देख मैंने सबके सामने उसकी शादी कराने का ऐलान किया और उसी समय प्रण लिया कि आज से मैं बेसहारा और गरीब कन्याओं की शादी कराऊंगा।''
बाबा के मुताबिक 2005 में पहली बार रीता के साथ उन्होंने 21 गरीब कन्याओं की शादी करवाकर इस मुहिम की शुरुआत की थी। उसके बाद से लगातार यह सिलसिला जारी है। बीते साल उन्होंने 100 से अधिक कन्याओं का सामूहिक विवाह करवाया। अगले साल भिखारी बाबा का 106 लड़कियों का विवाह कराने की प्रण है।
जिस अनाथ लड़की के माता-पिता नहीं होते हैं भिखारी बाबा उसके लिए उसी की जाति का वर खोजकर शादी करवाते हैं। यहीं नहीं लड़की को मां-बांप की कमी न महसूस हो इसके लिए वह बाकायदा कन्यादान भी करते हैं।

प्रेम का बिरवा



मैं
माँ की कोख में पल रहा
प्रेम का नन्हा बिरवा था
उसके पहले मैं ज्योति-पुंज का एक अंश था

एक दिन
अंतरिक्ष में चक्कर लगाते मैंने धरती पर
प्रेम का अद्भुत प्रकाश देखा
और उसे पास से देखने के लोभ में
माँ की कोख में गिर पडा़
कोख में बहुत अन्धेरा था
पर मैं खुश था
क्योंकि मैं आदमी की तरह
ले रहा था रूपाकार...

मेरी माँ
रात-दिन गुनगुनाया करती
उसके रोम-रोम से
प्रेम के सोते फूटते रहते
पिता इन दिनों बाहर थे
माँ मेरे सहारे प्रसन्न थी
पर कभी-कभी उदास हो जाती

क्योंकि अभी तक नहीं थी
उनके प्रेम को
स्वीकृति समाज की...
पर मुझे इससे क्या फर्क पड़ता
मैं तो प्रेम का बिरवा था
माँ की कोख में पल रहा...

और उस दिन
माँ बहुत खुश थी
पूरा घर महक रहा था
माँ के तन-मन की तरह
पिता आने वाले थे...

वे आए
माँ उनके सीने से लग गई
मैंने आँखें बंद कर ली
अचानक माँ की हिचकियों से चौंका
देखा पिता अजनबी से दूर खडे़ थे
हुआ क्या है...

मैंने कान लगाकर सुनने की
कोशिश की
और जो सुनाई पडा़
उसने मुझे काठ कर दिया

पिता
मुझे अपना मानने से इन्कार कर रहे थे
वे मेरी हत्या की बात भी
कह रहे थे
मैं सदमें में था

यह वही आदमी है क्या
जिसकी आँखों में मैंने
उस दिन इतना प्यार देखा था
माँ तो बेचारी भोली स्त्री थी
मैं अंतरिक्ष का वासी
कैसे धोखा खा गया...?

जी चाहा
ऐसे आदमी की हत्या कर दूँ
जो माँ को भी माँ की तरह
कमज़ोर... मज़बूर
ओर सीमाओं में जकड़े था

पिता चले गए
और फिर माँ पर
ढाए जाने लगे जुल्म...
पूरा संसार ही जैसे हम दोनों का शत्रु बन गया था

अब मैं
पाप का बिरवा था
माँ की कोख में पल रहा...

मैं
कई-कई दिन
माँ के साथ
भूखा-प्यासा रहा
गालियाँ और मार सहता रहा
मैं... माँ को सान्त्वना
देना वाहता था

"मैं दूंगा तुम्हारा साथ...
तुम खुद को अकेली न समझो माँ...
पर माँ अपने दुख में डूबी
मेरी आवाज़ नहीं सुन पा रही थी
तभी तो हार रही थी
टूट रही थी...

मैं
इस
माँ के साथ
एक बडे़ कमरे में
बडी़-सी मेज़ पर लेटा हुँ

इस कमरे में
ढेर-सारे औजार हैं
और नाक-मुँह ढँकी नर्से...
मेरा जी घबरा रहा है
माँ के हाथ-पैरों को
ऊँचा करके बाँधा जा रहा है
जैसे जिबह के लिए बकरे को...

एक नर्स इन्जेक्शन लेकर
बढ़ रही है माँ की तरफ़
मैं डर के मारे आँखे बंद कर लेता हूँ
अचानक मेरे बदन में
जैसे सैंकड़ों सुइयाँ चुभने लगी हैं

मैं देखता हूँ
माँ बेहोश हो गई है
और नुकीले औजार मेरी ओर
बढ़ रहे हैं
मैं पूरे जोर से चीखता हूँ
माँ! मुझे बचाओ...

पर माँ निष्पंद पडी़ है...
मैं अकेला
और इतने खतरनाक शत्रु
संड़सी मुझे पकड़ने की कोशिश में है
मैं इधर-उधर दुबकने की कोशिश करता हूँ
पर कब तक...

संड़सी ने मेरे गले को पकड़ लिया है
हथौडा़ मेरे सिर को कुचल रहा है
माँ की कोख में फैली मेरी जड़ों को
बेदर्दी से काटा जा रहा है...

सोचता हूँ
जब माँ को होश आएगा
कितना रोएगी वह मेरे लिए
जब तक जीएगी... रोएगी
रोयेगी कि क्यों किया था उसने प्रेम...

मैं ठोस से तरल हो रहा हूँ
माँ... माँ मुझे क्षमा करना
मैं तुम्हारा साथ न दे सका
बहुत कमज़ोर निकला
तुम्हारी कोख में पल रहा
यह बिरवा

माँ... माँ।
- रंजना जायसवाल

तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है

तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है

लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है

तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है
- अदम गोंडवी

काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में

काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में

आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में

पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में

जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में
- अदम गोंडवी

गंगोत्री मंदिर में दलित सीखेंगे कर्मकांड


गंगोत्री मंदिर में अब दलित लड़कों को भी धर्म और कर्मकांड की शिक्षा दी जाएगी। यह ऐतिहासिक फैसला गंगोत्री के मुख्य पुजारी और प्रबंध अध्यक्ष पंडित संजीव सेमवाल ने लिया। इस मामले की पहल सांसद तरुण विजय ने गंगोत्री मंदिर में एक बैठक में की। लंबे विचार-विमर्श के बाद पुजारी इसके लिए तैयार हो गए।
मंदिर के पंडितों के मुताबिक यह फैसला हिंदू समुदाय की विभिन्न जातियों के बीच मौजूद भेदभाव को मिटाने में सहायक होगा। तरुण विजय ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताया और कहा कि पुजारी को दिल्ली में एक भव्य समारोह में सम्मानित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इसका सिस्टम जल्द ही तय कर लिया जाएगा।-नभाटा

होशियार रहिए, शहर आपका है. देश आपका है ..


लखनऊ शांत रहा. देश शांत है. मगर मुलायम सिंह को शायद अमन चैन और शांति पसंद नहीं. फैसला आ गया. दोनों पार्टी स्वागत कर रही है. लेकिन मुलायम अपनी जमीदोंज हो चुकी सपा के लिए जमीन तलाशने में लगे हैं. पूरा देश, क्या हिन्दू, क्या मुसलमान, सभी के लिए अयोध्या का फैसला सिर माथे. अब मुलायम को कौन समझाए की इस फैसले से पूरा देश खुश है. राजनितिक रोटियां सेंकना बंद कर दे. मुलायम ही नहीं कोई भी नेता अगर इस मसले को तूल देता है. तो वह देश की अमन चैन के लिए सबसे बड़ा खतरा है... होशियार रहिए .....यह शहर आपका है. देश आपका है ..

लखनऊ सहमा हुआ था





30 सितबंर 2010। लखनऊ आज सुबह से ही सबके नजरों में था। लोग डरे नहीं थे। सहमे भी नहीं थे। लेकिन सड़कों पर अजीब सी बैचेनी थी। खामोशी थी। हैरानी थी। सुबह से दोपहर। वक्त का पहिया तेजी के साथ चल रहा था। इस बीच दोपहर बीतने लगी। 3 बज गए। सवा तीन और फिर साढ़े तीन। लोगों की निगाहें टीवी से चिपकी थी। हम लोग अदालत तक नहीं गए। एक च...क्कर जरूर काटा। डालीबाग से अलीगंज। वहां से लखनऊ विश्वविधालय। कैसरबाग बस अड्डे। बसें खड़ी थी। मुसाफिर तो थे, लेकिन बसें नहीं। सड़कें सुनसान होती चली गईं। हजरतगंज में भी लोग नहीं दिखे। लखनऊ सहमा हुआ था। खास कर पुराना लखनऊ। चौक और नक्खास, चौपटिया। मुस्लिम बाहुल्य वाले इलाके से अफवाहें आ रही थीं। कहीं लाठी चलाने तो कहीं बम मिलने की। अदालत में फैसले की घड़ी आई। सब सब्र से फैसला सुनना चाहते थे। 24 सितंबर तक जहां फैसला मुसलमानों की तरफ जाता बताया जाता रहा, वहीं 30 सितंबर को त्रिकोणीय हो गया। यानि सभी पक्षों को बराबर-बराबर जमीन मिल गई। रात 12 बजे तक सब ठीक रहा। इंशा अल्ला करें सब ठीक रहे। अब सोने जा रहा हूं। रात ठीक रही तो 1 अक्तूबर को मेरा जन्म दिन है। ठीक से मन जाएगा, नहीं तो शुक्रवार को भी शायद ही छुट्टी मिल पाए। शुभ रात्रि.....

भारतीयों के पैसों पर ठाठ, फिर भी हूपर नाराज

खराब तैयारियों का ढोल पीट रहे कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन (सीजीएफ) के मुख्य कार्यकारी माइक हूपर खुद पिछले दो साल से भी ज्यादा समय से भारत में राजसी ठाठ के मजे उठा रहे हैं। बावजूद इसके मिस्टर हूपर हैं कि खुश होने को राजी ही नहीं होते। एक टीवी चैनल की मानें तो करोड़ों भारतीयों की गाड़ी कमाई पर हूपर ऐश कर रहे हैं और आलोचना कर रहे हैं। चैनल का दावा है कि पिछले २६ महीनों से हूपर का बोझ सीडब्ल्यूजी आयोजन समिति भुगत रही है। जिस आलीशान घर में वे ठहरे हैं, उसका सालाना खर्चा 18 लाख रुपए से भी ज्यादा है। आयोजन समिति 4 लाख 50हजार रुपए मासिक किराए के रूप में चुका रही है। तिमाही किस्त के आधार पर आयोजन समिति को 13लाख 50रुपए देने पड़ रहे हैं। सिर्फ घर का किराया ही नहीं, बल्कि उनकी खिदमत में लगे छह लोगों को 37हजार 375रुपए मासिक वेतन का भी भुगतान किया जा रहा है। बात सिर्फ यहीं नहीं रूकी बल्कि आयोजन समिति ने एक साल के दौरान 86लाख रुपए के टैक्स का बोझ भी देशवासियों के कंधों पर ही डाला है। भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) के उपाध्यक्ष विजय कुमार मल्होत्रा ने इस पूरे मामले पर जांच की मांग की है। उन्होंने कहा, "मुझे इस बारे में पूरी जानकारी नहीं है। हम तथ्य इकट्ठा कर रहे हैं कि आखिर सही मायने में इन लोगों पर कितना पैसा खर्च किया जा रहा है। इसके अलावा क्या वे पिछले कॉमनवेल्थ में भी इसी प्रक्रिया से गुजरे थे या नहीं। पूरी जानकारी इकट्ठा करने के बाद ही हम कोई प्रतिक्रिया करेंगे।"हूपर पहले से ही भारत के खिलाफ अपनी बयानबाजी के कारण सभी की आंख का कांटा बन चुके हैं। कम बोलने की सीख देते हुए मल्होत्रा ने कहा, "वह यहां लंबे समय से हैं और निश्चित तौर पर वह आयोजन समिति का एक हिस्सा है। इसलिए उन्हें इस तरह की बयानबाजी नहीं करनी चाहिए।" हूपर ने हाल ही में कहा था कि सरकारी एंजेसियों ने सही समय पर एक्शन नहीं लिया, जिसका खामियाजा अब भुगतना पड़ रहा है। हूपर के बयान पर भड़की शीला दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भारत की जनसंख्या के बारे में कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन (सीजीएफ) के मुख्य कार्यकारी माइक हूपर के बयान से खासी नाराज हैं। शीला दीक्षित ने कहा कि हूपर की यह टिप्पणी अवांछनीय और गैर राजनयिक है। हूपर ने खेलों की तैयारियों में देरी के लिए दिल्ली की अधिक जनसंख्या और ट्रैफिक जाम को दोषी ठहराया था।नयी दुनिया

ये हैं तीन जज, जो सुनायेंगे अयोध्या पर फैसला

न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा
जन्मतिथि- 02/10/1948 कार्यभार ग्रहण -20/10/2005 अवकाश प्राप्त करने की तिथि- 01/10/2010। संक्षिप्त परिचय १967 में स्नातक तथा एलएलबी 1970 में। जुलाई 1989 से अक्टूबर 1991 तक चीफ लॉ आफिसर उप्र वित्त निगम, संयुक्त सचिव व ज्वांइट एलआर उप?्र सरकार, सितंबर 1994 से 1997 तक। विशेष सचिव व एडीशनल एलआर 1997 से फरवरी2002 तक। सचिव न्याय और एलआर मई 2002 से जुलाई2002 तक। मुख सचिव संसदीय कार्य उप्र सरकार अगस्त 2003 से अगस्त 2004 तक। प्रमुख सचिव न्याय और एलआर अगस्त 2004 से अक्टूबर 2005 तक। उप्र प्रांतीय न्यायिक सेवा में 1972 में नियुक्त 1985 में उच्च न्यायिक सेवा में पदोन्नति, 2002 में जिला एवं सेशन जज के रूप में पदोनति। 20/10/2005 को हाईकोर्ट के जज बने स्थायी जज के रूप में 17/09/2007 को शपथ ग्रहण।

न्यायमूर्ति सुधीर अग?वाल
जन्म - 24/04/1958 कार्यभार ग्रहण - 5/10/2005 अवकाश प्राप्त करने की तिथि- 23/04/2020। संक्षिप्त परिचय स्नातक साइंस आगरा विश्वविद्यालय आगरा 1977, मेरठ विश्वविद्यालय से एलएलबी 1980 में। 1980 में एडवोकेट के तौर पर पंजीकरण। 1980 से इलाहाबाद हाईकोर्ट में टैक्स मामलों की प्रैक्टिस शुरू की। बाद मंे सर्विस मैटर की प्रैक्टिस। स्टैंडिंग कौसिल उप्र पावर कारपोरेशन, उप्र राजकीय निर्माण निगम, इलाहाबाद विश्वविद्यालय। 19 सितंबर 2003 से एडीशन एडवोकेट जनरल इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति बनने तक। स्थायी न्यायमूर्ति के रूप में 10/08/2007 को शपथ ग्रहण।
न्यायमूर्ति सैय्यद रफत आलम
जन्म-31/01/1952 कार्यभार ग्रहण -21/12/2002 अवकाश प्राप्त करने की तिथि- 30/01/2014 संक्षिप्त परिचय स्नातक साइंस (आनर्स) वर्ष 1971 अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, एलएलबी 1975 अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से। 1975 में ही इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस के लिए पंजीकरण कराया। सिविल, सर्विस व राजस्व की प्रैक्टिस शुरू की। अलीगढ़ सिविल कोर्ट में दो साल तथा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 25 साल की प्रैक्टिस की। स्थायी न्यायधीश के रूप में 21/12/2002 से।

24 सितंबर एक टर्निग प्वॉइंट


अयोध्या विवाद पर फैसला आने से पहले फ्रांस के एक लेखक ने कहा है कि अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से राजीव गांधी जिम्मेदार थे। उन्होंने यह भी कहा है कि यह फैसला मुस्लिमों को मुख्यधारा में लाने का एक अच्छा मौका है। पेरिस में दक्षिण एशियाई राजनीति एवं इतिहास पढ़ाने वाले डॉ. क्रिस्टॉफ जैफ्रेलो ने अपनी पुस्तक रिलिजन, कास्ट एंड पॉलिटिक्स इन इंडिया में कहा है कि अयोध्या का विवादित ढांचा गिराए जाने के पीछे राजीव गांधी की अप्रत्यक्ष भूमिका थी क्योंकि वह हिंदू और मुसलमान समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ लड़ाने की कोशिश करते थे। उन्होंने कहा है, शाहबानो मामले से लेकर विश्व हिंदू परिषद के कहने पर विवादित ढांचे का ताला खुलवाने और फैजाबाद को राम की भूमि कहते हुए अपना चुनाव प्रचार शुरू करने तक वह हिंदुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर रहे थे। उन्होंने अपनी पुस्तक में यह भी कहा है कि यह फैसला भारतीय नेतृत्व के लिए मुसलमानों को फिर से मुख्यधारा में लाने का मौका होगा। भारत के इतिहास में 24 सितंबर एक टर्निग प्वॉइंट साबित होगा। उनका मानना है कि मेल-मिलाप के प्रयास होने चाहिए और हिंदूवादी ताकतों की ओर से यह पहल होनी चाहिए। उनके अडि़यल रवैये से मुश्किलें ही आएंगी। जैफ्रेलो ने कहा कि भगवा ब्रिगेड को मुस्लिमों की खिलाफत करने से पहले दो बार सोचना पड़ेगा क्योंकि 2009 के लोकसभा चुनाव में भारतीय मध्य वर्ग का रुख उनके खिलाफ था। मुसलमानों के बाबत उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ फैसले का आना दोधारी तलवार जैसा होगा क्योंकि वे इसे बार-बार पराजय स्वीकार करने के रूप में देख सकते हैं।

तो यह है राम जन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद का इतिहास



अयोध्या में सदियों से चले आ रहे राम जन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद के ऐतिहासिक विवाद का वर्तमान अध्याय 22-23 दिसंबर, 1949 को मस्जिद के अंदर कथित तौर पर चोरी - छिपे मूर्तियां रखने से शुरू हुआ था.
शुरूआती मुद्दा सिर्फ़ ये था कि ये मूर्तियां मस्जिद के आँगन में क़ायम कथित राम चबूतरे पर वापस जाएँ या वहीं उनकी पूजा अर्चना चलती रहे.
मगर 60 साल के लंबे सफ़र में अदालत को अब मुख्य रूप से ये तय करना है कि क्या विवादित मस्जिद कोई हिंदू मंदिर तोड़कर बनाई गई थी और क्या विवादित स्थल भगवान राम का जन्म स्थान है?
वैसे तो हाईकोर्ट को दर्जनों वाद बिंदुओं पर फ़ैसला देना है, लेकिन दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा ये है कि क्या विवादित इमारत एक मस्जिद थी, वह कब बनी और क्या उसे बाबर अथवा मीर बाक़ी ने बनवाया?
इसी के साथ कुछ तकनीकी या क़ानूनी सवाल भी हैं. मसलन क्या जिन लोगों ने दावे दायर किए हैं , उन्हें इसका हक़ है? क्या उन्होंने उसके लिए ज़रुरी नोटिस वग़ैरह देने की औपचारिकताएँ पूरी की हैं और क्या ये दावे क़ानून के तहत निर्धारित समय सीमा के अंदर दाख़िल किए गए?
अदालत को ये भी तय करना है कि क्या इसी मसले पर क़रीब सवा सौ साल पहले 1885 – 86 में अदालत के ज़रिए दिए गए फ़ैसले अभी लागू हैं.
उस समय हिंदुओं की पंचायती संस्था निर्मोही अखाड़ा ने मस्जिद से सटे राम चबूतरे पर मंदिर बनाने का दावा किया था, जिसे अदालत ने यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया था कि ऐसा होने से वहाँ रोज़- रोज़ सांप्रदायिक झगड़े और ख़ून- ख़राबे का कारण बन जाएगा.
अदालत ने ये भी कहा था कि हिंदुओं के ज़रिए पवित्र समझे जाने वाले स्थान पर मस्जिद का निर्माण दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन अब इतिहास में हुई ग़लती को साढ़े तीन सौ साल बाद ठीक नही किया जा सकता.
मामले को हल करने के लिए सरकारों ने अनेकों बार संबंधित पक्षों की बातचीत कराई, लेकिन कोई निष्कर्ष नही निकला. लेकिन बातचीत में मुख्य बिंदु यह बन गया कि क्या मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई अथवा नही.
सुप्रीम कोर्ट ने भी 1994 में इस मामले में अपनी राय देने से इनकार कर दिया कि क्या वहाँ कोई मंदिर तोड़कर कोई मस्जिद बनाई गई थी.
गेंद अब हाईकोर्ट के पाले में है. मसला तय करने के लिए अदालत ने ज़ुबानी और दस्तावेज़ी सबूतों के अलावा पुरातात्विक खुदाई करवाकर एक रिपोर्ट भी हासिल कर ली है, जिसमें मुख्य रूप से ये कहा गया है कि विवादित मस्जिद के नीचे खुदाई में मंदिर जैसी एक विशाल इमारत , खम्भे , एक शिव मंदिर और कुछ मूर्तियों के अवशेष मिले हैं.
लेकिन मुस्लिम पक्ष ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की इस रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति करते हुए उसे सबूतों में शामिल न करने की बात कही है, जबकि हिंदू पक्ष इस रिपोर्ट के अपने दावे की पुष्टि में प्रमाण मानते हैं.
अदालत में मुख्य रूप से चार मुक़दमे विचाराधीन हैं, तीन हिंदू पक्ष के और एक मुस्लिम पक्ष का. लेकिन वादी प्रतिवादी कुल मिलाकर मुक़दमे में लगभग तीस पक्षकार हैं.
सरकार मुकदमे में पक्षकार है, लेकिन उसकी तरफ़ से कोई अलग से पैरवी नही हो रही है. सरकार की तरफ़ से शुरुआत में सिर्फ़ ये कहा गया था कि वह स्थान 22/ 23 दिसंबर 1949 तक मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होती रही है.
इसी दिन मस्जिद में मूर्तियाँ रखने का मुक़दमा भी पुलिस ने अपनी तरफ़ से क़ायम करवाया था, जिसके आधार पर 29 दिसंबर 1949 को मस्जिद कुर्क करके ताला लगा दिया गया था.
इमारत तत्कालीन नगरपालिका अध्यक्ष प्रिय दत्त राम की सुपुर्दगी में दे दी गई और उन्हें ही मूर्तियों की पूजा आदि की ज़िम्मेदारी भी दे दी गई.
आरोप हैं कि तत्कालीन ज़िला मजिस्ट्रेट केके नैयर भीतर- भीतर उन लोगों का साथ दे रहे थे, जिन्होंने मूर्तियाँ मस्जिद के अंदर रखीं. इसीलिए उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के कहने के बावजूद मूर्तियां नहीं हटवाईं.
जनवरी 16, 1950 को हिंदू महासभा के एक कार्यकर्ता गोपाल सिंह विशारद ने सिविल कोर्ट में ये अर्ज़ी दायर की कि मूर्तियों को वहाँ से न हटाया जाए और एक राम भक्त के रूप में उन्हें वहाँ पूजा अर्चना की अनुमति दी जाए.
सिविल कोर्ट ने ऐसा ही आदेश पारित कर दिया. अदालत ने पूजा आदि के लिए रिसीवर की व्यवस्था भी बहाल रखी. इस मुक़दमे में सरकार को नोटिस देने की औपचारिकता पूरी नही की गई थी. संभवतः इसीलिए कुछ दिन बाद ऐसा ही एक और दावा दिगंबर अखाड़ा के राम चंद्र दास परमहंस ने दायर किया, जो उन्होंने बाद में 1989 में वापस ले लिया.
फिर 1959 में हिंदुओं की पंचायती संस्था निर्मोही अखाड़ा ने अदालत में तीसरा मुक़दमा दर्ज करके कहा कि उस स्थान पर सदा से राम जन्म स्थान मंदिर था और वह निर्मोही अखाड़ा की संपत्ति है, इसलिए रिसीवर हटाकर इमारत उसे सौंप दी जाए.
निर्मोही अखाड़ा का तर्क है कि मंदिर को तोड़ने के प्रयास किए गए पर वह सफल नही हुए और हिंदू वहाँ हमेशा पूजा करते रहे. उनका यह भी कहना है कि 1934 के दंगों के बाद मुसलमानों ने डर के मारे वहाँ जाना छोड़ दिया था, और तब से वहाँ नमाज़ नही पढ़ी गई. इसलिए हिंदुओं का दावा पुख़ता हो गया.
दो साल बाद सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड और कुछ स्थानीय मुसलमानों ने चौथा मुक़दमा दायर करके कहा कि बादशाह बाबर ने 1528 में यह मस्जिद बनवाई थी और 22/ 23 दिसंबर, 1949 तक यह मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होती रही है. इतने लंबे समय तक उनका कब्ज़ा रहा. इसे मस्जिद घोषित कर उन्हें क़ब्जा दिलाया जाए.
मुस्लिम पक्ष का तर्क है कि निर्मोही अखाड़ा ने 1885 के अपने मुक़दमे में केवल राम चबूतरे पर दावा किया था, न कि मस्जिद पर और वह अब उससे पलट नही सकता. मुस्लिम पक्ष का कहना है कि अदालत का तत्कालीन फ़ैसला अब भी बाध्यकारी है.
मुस्लिम पक्ष राम चबूतरे पर हिंदुओं के क़ब्ज़े और दावे को स्वीकार करता है.
मुस्लिम पक्ष तर्क में यह तो मानता है कि वर्तमान अयोध्या वही अयोध्या है जहां राम चन्द्र जी पैदा हुए, लेकिन बाबर ने जहाँ मस्जिद बनवाई, वह ख़ाली जगह थी.
क़रीब चार दशक तक यह विवाद अयोध्या से लखनऊ तक सीमित रहा. लेकिन 1984 में राम जन्म भूमि मुक्ति यज्ञ समिति ने विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सहयोग से जन्म भूमि का ताला खोलने का ज़बरदस्त अभियान चलाकर इसे राष्ट्रीय मंच पर ला दिया. इस समिति के अध्यक्ष गोरक्ष पीठाधीश्वर हिंदू महासभा नेता महंथ अवैद्य नाथ ने और महामंत्री कांग्रेस नेता तथा उत्तर प्रदेश सरकार में पूर्व मंत्री दाऊ दयाल खन्ना इसमें शामिल थे.
एक स्थानीय वकील उमेश चंद्र पाण्डे की दरख़ास्त पर तत्कालीन ज़िला जज फ़ैज़ाबाद के एम पाण्डे ने एक फऱवरी 1986 को विवादित परिसर का ताला खोलने का एकतरफ़ा आदेश पारित कर दिया, जिसकी तीखी प्रतिक्रिया मुस्लिम समुदाय में हुई.
इसी की प्रतिक्रिया में फ़रवरी, 1986 में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन हुआ और मुस्लिम समुदाय ने भी विश्व हिंदू परिषद की तरह आन्दोलन और संघर्ष का रास्ता अख़्तियार किया.
ताला खोलने के आदेश के ख़िलाफ़ मुस्लिम समुदाय की अपील अभी भी कोर्ट में लंबित है.
मामले में एक और मोड 1989 के आम चुनाव से पहले आया जब विश्व हिंदू परिषद के एक नेता और रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने एक जुलाई को भगवान राम के मित्र के रूप में पांचवां दावा फ़ैज़ाबाद की अदालत में दायर किया.
इस दावे में स्वीकार किया गया कि 23 दिसंबर 1949 को राम चबूतरे की मूर्तियाँ मस्जिद के अंदर रखी गईं. दावा किया गया कि जन्म स्थान और भगवान राम दोनों पूज्य हैं और वही इस संपत्ति के मालिक.
इस मुक़दमे में मुख्य रूप से ज़ोर इस बात पर दिया गया है कि बादशाह बाबर ने एक पुराना राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाई. दावे के समर्थन में अनेक इतिहासकारों, सरकारी गज़ेटियर्स और पुरातात्विक साक्ष्यों का हवाला दिया गया है.
यह भी कहा गया कि राम जन्म भूमि न्यास इस स्थान पर एक विशाल मंदिर बनाना चाहता है. इस दावे में राम जन्म भूमि न्यास को भी प्रतिवादी बनाया गया. श्री अशोक सिंघल इस न्यास के मुख्य पदाधिकारी हैं.
इस तरह पहली बार विश्व हिंदू परिषद भी परोक्ष रूप से पक्षकार बना.
याद रहे कि राजीव गांधी ने 1989 में अपने चुनाव अभियान का श्रीगणेश फ़ैज़ाबाद में जन सभा कर राम राज्य की स्थापना के नारे के साथ किया था. चुनाव से पहले ही विवादित मस्जिद के सामने क़रीब दो सौ फुट की दूरी पर वीएचपी ने राम मंदिर का शिलान्यास किया, जो कांग्रेस से मुस्लिम समुदाय की नाराज़गी का कारण बना.
विश्व हिंदू परिषद ने 1989 में शिलान्यास से पूर्व इस मामले में कोर्ट आदेश के पालन की बात कही थी, पर अब वह संसद में कानून बनाकर मामले को हल करने की बात करती है, क्योंकि उसके मुताबिक़ अदालत आस्था के सवाल पर फ़ैसला नही कर सकती.
निर्मोही अखाड़ा और विश्व हिंदू परिषद अदालत की लड़ाई में एक दूसरे के विरोधी हैं.
जगदगुरु स्वामी स्वरूपानंद की राम जन्म भूमि पुनरुद्धार समिति भी 1989 में इस मामले में प्रतिवादी बनी. उनका दावा है कि पूरे देश के सनातन हिंदुओं का प्रतिनिधित्व यही संस्था करती है. उसके तर्क निर्मोही अखाड़ा से मिलते जुलते हैं.
हिंदुओं की दो और संस्थाएं हिंदू महासभा और आर्य प्रादेशिक सभा भी प्रतिवादी के रूप में इस स्थान पर सदियों से राम मंदिर होने का दावा करती हैं.
इनके अलावा सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने कई अन्य हिंदुओं को उनकी निजी हैसियत से भी प्रतिवादी बनाया हैं. इनमे हनुमान गढ़ी के धर्मदास प्रमुख हैं. धर्मदास और निर्मोही अखाड़ा की पुरानी लड़ाई है और वह विश्व हिंदू परिषद के क़रीब हैं.
निर्मोही अखाड़ा ने कई स्थानीय मुसलमानों को प्रतिवादी बनाया है. मुसलमानों की ओर से सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड मुख्य दावेदार है. सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने हाशिम अंसारी समेत कई स्थानीय मुसलमानों को अपने साथ पक्षकार बनाया है.
उसके अलावा जमीयत-ए-उलेमा हिंद, शिया वक़्फ़ बोर्ड, आल इण्डिया शिया कांफ्रेंस संस्थागत रूप से प्रतिवादी हैं. मुस्लिम पक्षों का सबका दावा लगभग एक जैसा है सिवा आल इण्डिया शिया कांफ्रेंस के जिसने पहले यह कहा था कि अगर मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात साबित हो जाए तो मुलिम अपना दावा छोड़ देंगे.
शुरू में इस मुक़दमे में कुल 23 प्लाट शामिल थे, जिनका रक़बा बहुत ज़्यादा था. लेकिन छह दिसंबर को विवादित मस्जिद ध्वस्त होने के बाद 1993 में केंद्र सरकार ने मामला हल करने और मंदिर मस्जिद दोनों बनवाने के लिए मस्जिद समेत 70 एकड़ ज़मीन अधिग्रहित कर ली.
ज़मीन अधिग्रहण क़ानून को वैध ठहराते हुए 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को अब केवल उस स्थान का मालिकाना हक़ तय करना है जहाँ पर विवादित मस्जिद थी.
इस तरह अब मात्र क़रीब आधा बिस्वा ज़मीन का मुकदमा बचा है. जीतने वाले पक्ष को अगल-बग़ल की अधिग्रहीत भूमि ज़रुरत के मुताबिक मिलेगी.
कहने को यह आधा बिस्वा ज़मीन का मामला है लेकिन करोड़ों हिंदुओं और मुसलमानों की भावनाएं अब इससे जुड़ गई हैं. अदालत और समूची न्यायपालिका की प्रतिष्ठा इससे जुडी है. अदालत के फ़ैसले को लागू कराना सरकार का दायित्व होगा.
इसलिए सब मिलाकर यह मामला पूरे भारतीय समाज और संवैधानिक-लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए चुनौती बन गया है।

रामदत्त त्रिपाठी, बीबीसी संवाददाता

शहीद की मां बोली, नेता ही करते हैं टॉर्चर


जंग में लड़ते हैं सिपाही, सुर्खरू होते हैं जिल्लेइलाही। कारगिल युद्ध में अपनी जान न्यौछावर करने वाले शहीदों के परिजनों के हालात उपरोक्त पक्तियां बखूबी बयां करती हैं। इकलौते बेटे को मरणोपरांत शौर्य चक्र न मिलने से कारगिल के शहीद राइफलमैन सुनील जंग महत की मां आहत हैं। शौर्य चक्र के लिए लगातार दिल्ली निजाम में दस्तक देने वाली मां सरकारी रवैये से विचलित जरूर हैं, लेकिन लड़ाई लड़ने का संकल्प बरकरार है। जबकि लांस नायक केवलानंद द्विवेदी की विधवा कमला देवी चार साल पहले सरकारी क्वार्टर छोड़ कर गुमनामी की जिंदगी जी रही हैं। इन सूरमाओं के शहादत दिवस पर नेता और अधिकारी प्रतिमाओं पर माला चढ़ा अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। उन्हें इतनी भी फुर्सत नहीं कि शहीदों के परिजनों से मिल उनकी तकलीफ को समझ सकें।
कारगिल युद्ध में शहीद हुए २ राष्ट्रीय राइफल रेजीमेंट के मेजर विवेक गुप्ता को मरणोपरांत महावीर चक्र प्रदान किया गया। इनका परिवार कुछ साल पहले लखनऊ छोड़ कर अपने पैतृक शहर देहरादून चला गया। परिवार पहले उस्मान एन्क्लेव, अलीगंज में रह रहा था। जबकि शहीद कैप्टन आदित्य मिश्र के पिता ले. जनरल जी.एस. मिश्र सरकार और नेताओं पर बिना कुछ बोले ही अपनी व्यथा बयां कर देते हैं। शहीद कैप्टन मनोज पाण्डेय के पिता को पेट्रोल पंप, सरकारी आवास तो मिल गया, लेकिन शहीद के छोटे भाई मनमोहन पाण्डेय आज भी एक अदद स्थायी नौकरी के मोहताज हैं। वे अस्थायी तौर पर विधानसभा में असिस्टेंट मार्शल पद पर नौकरी कर रहे हैं। सूबेदार नर नारायण जंग चाहते थे कि उनका इकलौता बेटा सेना में बड़ा अधिकारी बन उनके सीने को चौड़ा कर दे। बेटे सुनील जंग को सेना की भर्ती के लिए तैयार करना शुरू कर दिया था। १९९५ में वह घड़ी भी आ गई, जब सुनील जंग सेना में बतौर राइफलमैन भर्ती हो गया। अभ्यास के बाद पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर के कारगिल सेक्टर में हुई। १९९९ में कारगिल युद्ध में पाक फौज के सिपाहियों को खदेड़ते हुए सुनील जंग वीरगति को प्राप्त हो गया। शहादत पर मां वीना महत खूब रोईं। शहादत के करीब एक साल तक अधिकारी, नेता और सामाजिक कार्यकर्ता नर नारायण जंग को हिम्मत देते रहे लेकिन वक्त बीतने के साथ सब कुछ वीरान होता चला गया। शहादत के ११ साल बाद स्थिति यह है कि उनके परिजनों का, बड़े नेता और अधिकारियों की बात तो दूर स्थानीय नेता भी दुख दर्द पूछने की जहमत नहीं उठाते। कारगिल विजय दिवस पर सेना और जिला प्रशासन ने याद कर लिया तो ठीक, नहीं तो अपने बेटे की तस्वीर देख कर मां वीना गर्वित हो जाती है।
४८ वर्षीय वीना महत अपने पल्लू से पावर के चश्मे को साफ करते हुए कुछ सोचती हैं, माथे पर शिकन आ जाती है। क्या बताऊं, मेरा एक ही बेटा था, बड़ा हैंडसम, खूबसूरत...। अपने पापा की तरह फौज में जाने के लिए उतावला था। जब वह ११ साल का था, तभी फौज में भर्ती होने की जिद पकड़ ली। बेटा सेना में भर्ती हुआ, पहली ही पोस्टिंग में दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए कारगिल में मोर्चा संभाला। ११ दिन तक मेरे बच्चे ने बर्फ खाकर दुश्मनों को नेस्तनाबूद कर दिया। कहते-कहते रुक जाती हैं वीना। एलबम निकाल कर फोटो दिखाती हैं और आंखों को साफ करती हैं, शायद उनकी आंखों में आंसू आ गए थे, जिसे वे जताना नहीं चाहती थीं।
दो कमरे के किराए वाले मकान में रह रहे वीना और उनके पति अपने दो बेटियों और दामाद के साथ गुजर-बसर कर रहे हैं। सरकार ने जंग की शहादत के बाद जीविका के लिए गैस एजेंसी का लाइसेंस दिया है। वीना महत खुद गोसाईंगंज स्थित गैस एजेंसी चला रही हैं, लेकिन लोगों की धमकियां उन्हें परेशान कर रही हैं। वे कहती हैं कि खास कर नेता उन्हें टार्चर कर रहे हैं। नेताओं के इस रवैये से दुखी वीना मजबूरी में परिवार की जीविका के लिए एजेंसी चला रही हैं। दुखी होकर अपने पति से अपने पुश्तैनी घर हिमाचल के धर्मशाला चलने को कहती हैं, लेकिन अब लखनऊ का तोपखाना बाजार उनसे छोड़ा नहीं जाता।

मायावती पर भारी लखनऊ विकास प्राधिकरण

मुझे चैन से सोने देना

कब्र
मरने पर मेरे मुझे
सुपुर्दे ख़ाक कर देना
मेरी कब्र न बनाना
मुझे चैन से सोने देना.
नहीं चाहता खलल
नींद मे मेरी आये
ता उम्र उलझा रहा फिक्र मे
मर कर तो सकूँ आये.
मरने पर किसी के
जब फातिया पढ़ते हैं
चैन से सोने कि
सब दुआ करते हैं.
फिर क्यों कब्र किसी कि
वो बनाते हैं
कब्र पर इंसान नहीं
बस उल्लू नज़र आते हैं.
टूटे हुए पत्तों का ढेर
कब्र पर छा जाता है
जानने को हाल कोई
कब्र तक नहीं आता है.
मैं जिन्दा तो दबा रहा
फिक्रों के बोझ से
मरने पर न दबाना
मुझे पत्तों के बोझ से.
पत्तें भी तन्हां हैं
शाख से अपनी
सुपुर्दे ख़ाक कर देने
उनको भी कहीं.
चैन से सो जाएँ वे भी
तुम दुआ करना
उनके भी अमन कि खातिर
एक फातिया पढ़ना.
डॉ कीर्तिवर्धन

तेरी अदा


मोटी मोटी आँखें
रंग आँखों का काला
नागिन सी जुल्फें काली
घटा सी भारी भारी
लहराती है कमर पर
जब चलती है तू इठलाकर
वों तेरा बातें करना
व़ो तेरा हंसना मुस्कुराना
रूठकर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराना
कर जाता है घायल
हो जाते हैं कायल
चलता है जब
इक तीर जिगर पर
जब देखती है तू आँखें मिचालाकारा
नहीं है ठीक सीने जिगर पर
अंखियों का वार करना
तेरा बंद आँखों से सब कुछ कह जाना
कर जाता है घायल
तुम्हारा अपने आप में यूँ सिमट जाना
मगर जब
कहते हो बातें भी न करना
न हाल दर्दे दिल का सुनना
और न अपने दिल का हाल सुनाना
मार डालेगा ये बेरुखी का आलम तुम्हारा

भोपाल नहीं, देश की सबसे बड़ी त्रासदी है


देश की सबसे बड़ी भोपाल गैस त्रासदी का एक और कड़वा सच सामने आया है। भोपाल के तत्कालीन डीएम मोती लाल सिंह ने खुलासा किया है कि सूबे की सरकार ने गैस त्रासदी के मुख्य आरोपी एंडरस को बचाने का पूरा प्रयास किया था। श्री सिंह ने कहा कि 7 दिसंबर 1984 की सुबह एंडरसन भोपाल आया था लेकिन उसी शाम को राज्य सरकार के भारी दबाव के चलते उसे चार्टर्ड प्लेन से वापस दिल्ली भेज दिया गया। सरकारें जनता की नहीं बल्कि धनवानों की जेब में हैं। यह हमेशा से होता रहा है की सरकार पूंजीपतियों से चंदा लेकर आम मजलूमों को भूल जाती है।

मोती लाल सिंह ने कहा कि उस समय राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और राज्य के मुख्य सचिव ब्रम्ह स्वरूप थे, जिनके दिशा निर्देश पर एंडरसन को पकड़कर छोड़ दिया गया और सही सलामत दिल्ली भेजा गया। उन्होंने राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि 7 दिसंबर को एंडरसन को पकड़कर विमान से भोपाल लाया गया था लेकिन उस दिन सचिव ब्रम्ह स्वरूप ने अपने कमरे में हमें बुलाकर यह निर्देश दिया कि एंडरसन को सही सलामत वापस भेजना है, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। सचिव ने कहा कि एंडरसन को भोपाल एयरपोर्ट से ही वापस भेजना है, जिसके बाद एक चार्टर्ड विमान की व्यवस्था करके उसे दिल्ली भेज दिया गया।

उन्होंने कहा कि एंडरसन प्रभावित क्षेत्र को देखना चाहते थे और पीड़ितों से मिलने के लिए वे काफी परेशान थे। वे बार-बार हमसे पूछ रहे थे कि यह हादसा कैसे हो गया। हमने उन्हें सारी बातें विस्तार से बताईं और कहा कि अब आप जल्द से जल्द भोपाल छोड़ दें और दोबारा यहां आने की कोशिश न कीजिएगा।

भोपाल गैस त्रासदी : दफन हुआ इंसाफ


25 साल पहले जिस भोपाल गैस कांड में हजारों लोग मारे गए थे और अनेकों लोग स्थायी रूप से विकलांग हो गए थे, उसके जिम्मेदार लोगों को सिर्फ दो साल की सजा और प्रत्येक पर एक लाख एक हजार 750 रुपए का जुर्माना लगाया गया है। सजा सुनाए जाने के कुछ मिनट बाद ही 25 हजार रुपए के मुचलके पर सात दोषियों को जमानत भी मिल गई। ऊपरी अदालत में अपील करने के लिए इनके पास 30 दिन का समय है।

और अब अदालत ने निकाले आंसू

भोपाल गैस पीड़ितों को इंसाफ दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे स्वयंसेवी संगठनों ने इसे बहुत देर से दी गई बहुत हल्की सजाया बताया और आरोप लगाया कि अभियोजन और सीबीआई ने इस मामले में पीड़ितों का पक्ष प्रभावी ढंग से नहीं रखा। भोपाल जिला अदालत ने सोमवार दोपहर गैस कांड के आरोपी केशव महेंद्रा सहित सात आरोपियों को दोषी मानते हुए सजा सुनाई।

* ‘हमारी कानूनी व्‍यवस्‍था पर सवाल है यह फैसला’
* ‘भोपाल’ में दिल्‍ली के लिए भी छिपा है सबक
* त्रासदी से फैसले तक का सफर
न्‍यायिक व्‍यवस्‍था के लिए खतरे की घंटी!

अदालत ने यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड पर भी पांच लाख रुपए का जुर्माना किया है। फैसला सुनाए जाते वक्त महेंद्रा सहित पांच आरोपी अदालत में उपस्थित थे। सीजेएम मोहन पी तिवारी द्वारा अंग्रेजी में दिए गए 93 पृष्ठीय फैसले में फरार आरोपी यूनियन कार्बाइड कापरेरेशन के तत्कालीन चेयरमेन वारेन एंडरसन और गैरहाजिर चल रहीं दो कंपनियों कार्बाइड कापरेरेशन, कार्बाइड ईस्टर्न इंडिया (हांगकांग) का उल्लेख नहीं है। इस मामले में सीबीआई की ओर से सी. सहाय ने पैरवी की। इस मामले का एक आरोपी शकील अहमद कुरैशी फैसले के वक्त कोर्ट में मौजूद नहीं था। उनके वकील ने अदालत को बताया कि वह इंदौर में गंभीर रूप से बीमार है। उसे एंबुलेंस से भोपाल लाया जा रहा है। अदालत ने इस बात को मानकर शकील की अनुपस्थिति में ही फैसला सुना दिया, जबकि शाम 6 बजे तक शकील अदालत में पेश नहीं हुआ था।

छावनी में तब्दील रही अदालत:

एहतियात के तौर पर पुलिस ने जिला अदालत को छावनी में तब्दील कर रखा था। इससे यहां पेशी पर आए अन्य लोगों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ा। सीजेएम कोर्ट में भी जिन लोगों की पेशी थी, उन्हें अदालत के अंदर जाने नहीं दिया गया। कोर्ट का मुख्य प्रवेश द्वार सुबह दस बजे ही बंद करा दिया था। गेट नंबर एक के बाहर एक वज्र वाहन तैनात रहा।

गैस पीड़ित संगठन की प्रतिक्रिया:

भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के संयोजक अब्दुल जब्बार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में मुआवजा लेते समय जो समझौता हुआ था, उसमें मृतकों की संख्या तीन हजार से अधिक थी, यदि प्रत्येक व्यक्ति की मौत के लिए पांच हजार रुपए का जुर्माना किया जाता तो वह भी करोड़ों रुपए होता। उन्होंने कहा हैरत की बात है कि फैक्टरी के मालिक केशव महेंद्रा और फैक्ट्री के जो कर्मचारी आरोपी थे, उन सभी पर एक ही राशि का जुर्माना किया गया।

कितनी सजा

भादवि की धारा 304-ए : केशव महेंद्रा, विजय गोखले, किशोर कामदार, जे मुकुंद, एसपी चौधरी, केवी शेट्टी, एसआई कुरैशी को दो साल की जेल और एक लाख रुपए जुर्माना। इसी धारा में यूका पर पांच लाख रुपए का जुर्माना।

१. धारा 338 में केशव महेंद्र सहित सातों आरोपियों को एक साल की जेल और एक हजार का जुर्माना।

२. धारा 337 में केशव महेंद्रा सहित सातों आरोपियों को छह महीने की जेल और पांच सौ का जुर्माना।

३. धारा 336 में केशव महेंद्रा सहित सातों को तीन माह की जेल और प्रत्येक पर 250 रु. का जुर्माना।

इंतजार ही रहा न्याय

फैसला सुनने बड़ी संख्या में गैस पीड़ित महिलाएं और संगठनों के लोग पहुंचे थे, लेकिन पुलिस ने किसी को भी अदालत भवन में नहीं जाने दिया। विरोध पर पुलिस ने उनसे मारपीट की। गैस पीड़ितों का कहना था कि 25 साल से अपने हक की लड़ाई लड़ते-लड़ते लाठियां खाई। आज फैसले के दिन भी इसका शिकार होना पड़ा।



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साभार -दैनिक भास्कर

तेरा चेहरा...


हथेलियों पर देखा था जिसका चेहरा ..
रेखाएं मिलती, सिकुड़ती, फैलती ...
फिर तन सा जाता उसका चेहरा ...
यह चेहरा ही तो है जिसे रोज हथेलियों में ....
पढ़ा करते हैं .....

बारिश की बूंदों में हम भी करते थे मस्ती


बारिश की बूंदों से वर्षा रानी की याद आई.
जब हमें उसकी बूंदों से मिलती थी राहत.
उसकी हर बूंद से करते थे प्यार इतना,
की हर बूंद को हथेलियों से जकड कर ...
बाहों में भरते, दुलराते, छेड़ते ....
और फिर हथेलियों को गाल पर लगाते ....

हम भी कभी इश्क किया करते थे


जब उसकी धुन में जिया करते करते थे,
हम भी चुपचाप पिया करते थे,
आँखों में प्यास हुआ करती थी,
दिल में तूफान उठा करते थे,
लोग आते थे हमसे गजल सुनने,
हम उनकी बातें किया करते थे,
सच समझते थे उनके वादों को,
दिन रात उसकी यादो में जिया करते थे,
सपनो में उससे मिलकर,
दिल में फूल खिला करते थे,
घर की दीवार सजाने की खातिर,
हम उसका नाम लिखा करते थे,
आज उन्हें देखकर फिर याद आया,
हम भी कभी इश्क किया करते थे.
हम भी कभी इश्क किया करते थे.

पंजाब लश्कर और खालिस्तानी गुटों के निशाने पर


आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और खालिस्तान समर्थक गुट पंजाब में आतंकवादी हमलों की साजिश रच रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियों ने इस संबंध में चेतावनी जारी की है।

पंजाब पुलिस के सूत्रों ने खुफिया जानकारियों के हवाले से बताया कि पाकिस्तान, कनाडा और अन्य देशों में सक्रिय खालिस्तान समर्थक गुट लश्कर के संपर्क में आ चुके हैं। खुफिया एजेंसियों के दस्तावेजों से पता चलता है कि 'खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स' (केजेडएफ) पंजाब में आतंकवादी हमलों को अंजाम देने के लिए लश्कर के संपर्क में आ चुका है।

केजेडएफ के सदस्य रणजीत सिंह नीता को लश्कर सहित अन्य आतंकवादी संगठनों से समर्थन हासिल करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

उल्लेखनीय है कि गुरदासपुर जिले का भामियाल सेक्टर गत 15 दिनों में आतंकवादी वारदातों का गवाह रहा है। ऐसा पहली बार हुआ है जब पाकिस्तान और कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी गुटों ने पंजाब को निशाना बनाया है।

गुरदासपुर जिले के नोराट जयमाल सिंह इलाके में 24 अप्रैल को पंजाब पुलिस ने दो पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार गिराया था। दोनों पक्षों के बीच हुई गोलीबारी में दो पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे और एक घायल हो गया था। यह इलाका जम्मू एवं कश्मीर सीमा के बेहद करीब है। भामियाल सेक्टर में 19 अप्रैल को भी पाकिस्तान की ओर से रॉकेट दागे गए थे।

पंजाब में पाकिस्तान से लगी 553 किलोमीटर लंबी अंतर्राष्ट्रीय सीमा है। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के पंजाब सीमांत के पुलिस उप महानिरीक्षक जागिर सिंह ने आईएएनएस से कहा, "प्रभावित इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है। गुरदासपुर सेक्टर में आतंकवादियों के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है।"

खुफिया सूचनाओं के अनुसार आतंकवादियों के निशाने पर डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल हैं। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के परिजन भी खालिस्तान समर्थक गुटों के निशाने पर हैं।

पंजाब में 31 अगस्त 1995 को खालिस्तान समर्थक मानव बम ने बेअंत सिंह की हत्या कर दी थी। पंजाब पुलिस के अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि जिन लोगों को निशाना बनाए जाने की सूचना मिली है, उनकी सुरक्षा व्यवस्था सख्त कर दी
उल्लेखनीय है कि पंजाब में अलगाववादियों का हिंसक अभियान दस वर्षों तक चला था। अलगाववादियों की हिंसक कार्रवाई में 25,000 लोग मारे गए थे। इस हिंसक अभियान को वर्ष 1993 में कुचल दिया गया था।
साभार - दैनिक भास्कर जोश १८

मेरी बेबो अब उसकी परी बन गई....


मेरी बेबो अब उसकी परी बन गई....
परी ही रहना उड़नपरी मत बनना ...
पंख संभालना, दरिन्दे बहुत है यहाँ ....

मेरी माँ


धूप हुई तो आंचल बन कर कोने-कोने छाई अम्मा,

सारे घर का शोर-शराबा, सूनापन तनहाई अम्मा।

दबंगई कायम है ...


हरियाणा और उत्तर प्रदेश में न केवल दलितों का शोषण हो रहा है, बल्कि दबंग सवर्णों द्वारा उनकी बहु- बेटियों पर फिकरे कसे जाते हैं। आपत्तिजनक टिप्पणी होती है। ताजा मिशाल हरियाणा के हिसार का है। जहाँ दलितों की बस्ती जलाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। तनाव बढ़ता जा रहा है। दलितों ने इस कांड में जान गंवाने वाले बाप-बेटी के अंतिम संस्कार से इनकार कर दिया है। उनकी मांग है कि पहले तमाम आरोपियों को गिरफ्तार किया जाए। बुधवार को मिर्चपुर गांव में दबंग सवर्णों ने दलितों के करीब 30 घरों को फूंक दिया। तनाव के चलते तमाम दलित परिवार गांव छोड़कर भाग रहे हैं।

दलितों का कहना है कि सुबह दबंग परिवारों के कुछ लड़कों ने उधर से गुजरते हुए आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। दलितों ने इसका विरोध किया था और हल्की-फुल्की झड़प भी हो गई थी। बाद में दबंगों के ये लड़के बड़ी तादाद में वापस आए और दलित बस्ती पर हमला बोल दिया। दबंगों ने करीब 30 घरों को आग के हवाले कर दिया। 18 साल की एक विकलांग लड़की सुमन जलते हुए घर से निकल नहीं पाई। उसके 70 साल के पिता ताराचंद ने उसे बचाने की कोशिश की पर दोनों ही इस बुरी तरह झुलस गए कि जान नहीं बच सकी।

इस घटना के बाद दलित बेहद हताश और गुस्से में हैं। उन्होंने दबंगों के इरादों के बारे में समय रहते पुलिस को सूचना भी दे दी थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। जाहिर है, कानून के राज की बात उनके लिए बेमानी हो चुकी है। कई डरे हुए दलित परिवार गांव छोड़कर जा रहे हैं। लेकिन दलितों का कहना है कि असल बेगुनाहों को पुलिस बचा रही है। उन्होंने हिसार के जनरल अस्पताल में मौजूद सुमन और ताराचंद के शव लेने से इंकार कर दिया है।


दोस्ती मरते दम तक निभाएंगे.....


खुदा से क्या मांगू तेरे वास्ते
सदा खुशियों से भरे हों तेरे रास्ते
हंसी तेरे चेहरे पे रहे इस तरह
खुशबू फूल का साथ निभाती है जिस तरह
सुख इतना मिले की तू दुःख को तरसे
पैसा शोहरत इज्ज़त रात दिन बरसे
आसमा हों या ज़मीन हर तरफ तेरा नाम हों
महकती हुई सुबह और लहलहाती शाम हो
तेरी कोशिश को कामयाबी की आदत हो जाये
सारा जग थम जाये तू जब भी गए
कभी कोई परेशानी तुझे न सताए
रात के अँधेरे में भी तू सदा चमचमाए
दुआ ये मेरी कुबूल हो जाये
खुशियाँ तेरे दर से न जाये
इक छोटी सी अर्जी है मान लेना
हम भी तेरे दोस्त हैं ये जान लेना
खुशियों में चाहे हम याद आए न आए
पर जब भी ज़रूरत पड़े हमारा नाम लेना
इस जहाँ में होंगे तो ज़रूर आएंगे
दोस्ती मरते दम तक निभाएंगे.....
एक बिछड़े दोस्त के लिए...

गोंडा की राजनीति में पंडितों को मरना और दलितों का शोषण ही लिखा है ....


पहले उ.प्र. के मंत्री रहे घनश्याम शुक्ला की हत्या, फिर राजनीति से छोटे स्तर पर जुड़े पंडितों की हत्या और अब एक और पंडित की भरी सभा में गोली मारकर हत्या. यह आग सालों से जल रही है.... गोंडा में पंडित और ठाकुर आपस में एक दुसरे की हत्या कर या करवा कर राजनीति की सीढ़ी चढ़ने का खेल, खेल रही है .... खासकर गोंडा में पंडित बनाम ठाकुर लड़ रहे है, पिस रहे हैं दलित. इसमे नुक्सान पंडितों क हो रहा है ... दलितों का शोषण किया जा रहा है .... यह लड़ाई कब ख़तम होगी, कुछ कहा नहीं जा सकता. इसी लड़ाई के कारण गोंडा आज भी कई साल पीछे है, जबकि पडोसी जिले कहीं ज्यादा विकसित हो चुके हैं ...
खबर यह है की ......
यूपी के गोंडा में अंबेडकर जयंती समारोह के अवसर आयोजित हो रही एक रैली के दौरान बहुजन समाज पार्टी के नेता की हत्या कर दी गई है। नेता का नाम हनुमान शरण शुक्ला है। घटना के समय वह मंच पर मौजूद थे।
केन्द्र सरकार की खिलाफत में पूरे जिले से जुटे बसपाइयों को बलिया से आए मुख्य अतिथि एवं जोनल कोआर्डीनेटर छट्ठ राम सम्बोधित कर रहे थे। तभी मंच की दाहिनी ओर से एक युवक दबे पांव आया और एक किनारे बैठे पार्टी नेता और जिला पंचायत सदस्य मंजू देवी शुक्ला के पति हनुमानशरण शुक्ल के सिर में सटाकर बारह बोर के तमंचे से एक गोली उतार दी। हत्यारा मौके से फरार हो गया। उन्हें तुरंत जिला अस्पताल पहुँचाया गया जहाँ डॉक्टरों ने बसपा नेता को मृत घोषित कर दिया।

अंधेर नगरी, चौपट राजा ...कबड्डी ...कबड्डी ...कबड्डी ...


पंजाब में कबड्डी चल रही है या, नौटंकी .....
दम तोडती हाकी की नर्सरी के लिए सरकार के पास देने को धेला नहीं है, लेकिन कबड्डी के लिए सरकारी खजाना खोल दिया है ....लोगों को बिजली-पानी ढंग से नहीं मिल रहा है ...पंजाब सरकार को केंद्र सरकार को देने के लिए के शेयर नहीं है, जिससे कई केंद्रीय फंड लेप्स हो गया है ....
इसे आप मर्जी जो कहें, हम इसे अंधेर नगरी, चौपट राजा कहेंगे ...
पंजाब बिजली संकट से जूझने लगा है । लेकिन हुकमरान कबड्डी खेलने और देखने में व्यस्त हैं।
तो सारे बोलो...कबड्डी....कबड्डी....कबड्डी.....कबड्डी.....कबड्डी......कबड्डी....कबड्डी..........कबड्डी....कबड्डी..

गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा पर हंगामा क्यों है बरपा



पहली अप्रैल से देश भर में लागू हुए शिक्षा अधिकार कानून को लेकर दिल्ली के पब्लिक स्कूलों समेत कई बड़े शहरों में स्कूल खोल कर धनकुबेर बने लोगों ने घोर आपत्ति जताई है. स्कूल के जरिये धनपति बने शिक्षा माफिया टाइप के लोगों को सरकार का आदेश ख़राब लग रहा है . यह बड़ी हैरानीजनक बात है . सरकार को शिक्षा के साथ - साथ स्वस्थ्य अधिकार क़ानून भी बनाना चाहिए. सभी को शिक्षा-स्वस्थ्य मौलिक अधिकार होना चाहिए. स्वस्थ्य-शिक्षा के खर्चे आम लोगों के विकास में सबसे बड़ी बाधा है. सरकारी जमीन पर बिना कोई टैक्स दिए स्कूल चलने वाले परबन्धन की फीस हर साल बढ़ जाती है, लेकिन जब गरीब के बच्चों को २५ फीसदी मुफ्त में पढ़ाने का क़ानून पास किया जाता है तो मानने से इंकार कर दिया जाता है. भारत में बेहतर शिक्षा अमीरों के घर तक सिमित होकर रह गयी. क्या गरीब बच्चों को बेहतर शिक्षा नहीं मिलनेचाहिए?
इस क़ानून को लेकर सबसे ज्यादा दिल्ली में हो हल्ला मचा है .. आखिर क्यों?
दिल्ली स्टेट पब्लिक स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन को शिक्षा की दुकानदारी पर क़ानून बर्दास्त नहीं है. दोनों हाथों से पैसे बटोर रहे इन लोगों को क़ानून से डर सताने लगा है की कहीं इनकी दुकानदारी चौपट न हो जाये. इनकी सीनाजोरी देखो..कहते हैं की शिक्षा अधिकार कानून को वह अपने स्कूल में लागू नहीं करेंगे। तर्क यह है की इस कानून में दिए गए प्रावधान हमारी शिक्षा के स्तर को दोयम दर्जे का बनाएंगे. जनाब शिक्षा स्तर ठीक रहेगा, दिक्कत इनकी जेब पर है. एक अप्रैल से केंद्र सरकार द्वारा 6 से 14 साल के हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने के लिए बनाया गया ऐतिहासिक शिक्षा का अधिकार कानून लागू कर दिया है. बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार एक्ट-2009 की वजह से यह संभव हुआ है।
मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिबल ने कड़े शब्दों में कहा है कि सभी निजी और अल्पसंख्यक स्कूलों को अपने यहां 25 फीसदी सीट गरीब बच्चों के लिए आरक्षित करनी होगी। जो भी इसका उल्लंघन करेगा, उसे दंडित किया जाएगा। एक अंग्रेजी न्यूज चैनल को दिए साक्षात्कार में सिबल ने कहा कि वर्ष 2011 से सभी स्कूलों को क्लास एक से 25 फीसदी सीट गरीब बच्चों के लिए आरक्षित करनी पड़ेगी। इसके विरोध में जाने वालों को दंड के लिए तैयार रहना होगा, क्योंकि यह अब कानून है।

देश का संबोधित किया प्रधानमंत्री ने
इस कानून के लागू होने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्र के नाम संदेश देते हुए शिक्षा के अधिकार और उसकी महत्ता को उजागर किया है। ये पहला मौका था जब आजाद भारत में प्रधानमंत्री ने किसी कानून को लेकर देश को संबोधित किया।
मनमोहन सिंह ने राष्ट्र के नाम अपने संदेश में कहा है कि शिक्षा के अधिकार के लिए पारित कानून बच्चों के लिए समर्पित है। बच्चों को शिक्षा दी जाना न सिर्फ राज्य सरकार बल्कि परिवार की भी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि बच्चों को ऐसे मूल्य दिए जाने चाहिए जो उन्हें एक जिम्मेदार और सक्रिय नागरिक बनाए। ताकि वे भारत के विकास में सहयोगी बनें।
संदेश में पीएम मनमोहन सिंह ने राज्य सरकारों से इसमें सहयोग की मांग की है। पीएम का यह राष्ट्र के नाम संदेश दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया। उन्होंने कहा कि पैसे की कमी से इसमें कोई कमी नहीं आने दी जाएगी। माना जा रहा है कि खुद मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने प्रधानमंत्री से देश को संबोधित करने का आग्रह किया था।

क्या है इस कानून की खासियत
- इस कानून की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अब सरकार के लिए उन बच्चों को शिक्षित करना जरूरी हो जाएगा जो 6-14 के आयु वर्ग में आते हैं।
- यह कानून स्कूलों में शिक्षक और छात्रों के अनुपात को सुधारने की बात करता है। मसलन अभी कई स्कूलों में सौ-सौ बच्चों पर एक ही शिक्षक हैं। लेकिन इस कानून में प्रावधन है कि एक शिक्षक पर 40 से अधिक छात्र नहीं होंगे। हालांकि यह कोठारी आयोग की अनुशंसा 1:30 से कम है।
- इस कानून के अनुसार राज्य सरकारों को बच्चों की आवश्यकता का ध्यान रखते हुए लाइब्रेरी, क्लासरुम, खेल का मैदान और अन्य जरूरी चीज उपलब्ध कराना होगा।
- 15 लाख नए शिक्षकों की भर्ती, जिसे एक अक्टूबर तक ट्रेन करना जरूरी है।
- स्कूल में प्रवेश के लिए मैनेजमेंट बर्थ सर्टिफिकेट फिर ट्रासंफर सर्टिफिकेट आधार पर प्रवेश से मना नहीं कर सकता।
- सत्र के दौरान कभी भी प्रवेश।
- निजी स्कूल में 25 फीसदी सीट गरीब बच्चों के लिए।

क्या हैं इस कानून की खामियां
- इस कानून की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें 0-6 आयुवर्ग और 14-18 के आयुवर्ग के बीच के बच्चों की बात नहीं कई गई है। जबकि संविधान के अनुछेच्द 45 में साफ शब्दों में कहा गया है कि संविधान के लागू होने के दस साल के अंदर सरकार 0-14 वर्ग के आयुवर्ग के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा देगी। हालांकि यह आज तक नहीं हो पाया।
- अंतराष्ट्रीय बाल अधिकार समझौते के अनुसार 18 साल तक की उम्र तक के बच्चों को बच्चा माना गया है। जिसे 142 देशों ने स्वीकार किया है। भारत भी उनमें से एक है। ऐसे में 14-18 आयुवर्ग के बच्चों को शिक्षा की बात इस कानून में नहीं कई गई है।
- इस कानून को केंद्र सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि में से एक बताया जा रहा है। जबकि संविधान में पहले से ही यह प्रावधान है और 2002 में हुए 86वें संशोधन में भी शिक्षा के अधिकार की बात कई गई थी। लेकिन सरकार अब जाकर यह कानून ला रही है। इन आठ सालों में बच्चों की पूरी एक पीढ़ी इस अधिकार से बाहर हो गई।

इतिहास
संविधान के अनुछेच्द 45 में 0-14 उम्र के बच्चों को शिक्षा देने की बात कही गई।
2002 में 86 वें संशोधन में शिक्षा के अधिकार की बात कही गई।
2009 में शिक्षा का अधिकार बिल पास हो सका, एक अप्रैल 2010 में इसे पूरे देश में लागू कर दिया जाएगा।

पंज-आब के पानी में यूरेनियम

पांच नदियों का द्वाब पंजाब, अब बे-आब हो रहा है। आर्सेनिक के बाद पंजाब के एक बड़े इलाके के भूजल और सतही जल में यूरेनियम पाया गया है। दक्षिण पश्चिम पंजाब क्षेत्र में “सेरेब्रल पाल्सी” से पीड़ित बच्चों के बालों में यूरेनियम के अंश पाये गए है। हाल ही में जर्मनी की एक लैब ने फरीदकोट के एक मंदबुद्धि संस्थान “बाबा फ़रीद केन्द्र” के बच्चों के बालों पर शोध के बाद रिपोर्ट दी है। जर्मनी की माइक्रो ट्रेस मिनेरल लैब की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि शोध किये गए लगभग 150 बच्चों के बालों में 82 से लेकर 87 प्रतिशत तक यूरेनियम पाया गया है। इस खुलासे के बाद गुरुनानक देव विश्वविद्यालय द्वारा एक विशेष वैज्ञानिक जाँच शुरु करने का फ़ैसला किया गया है।

डॉ अम्बेडकर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, जालन्धर के फ़िजिक्स विभाग में कार्यरत असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ रोहित मेहरा ने 34 गाँवों के विभिन्न हैण्डपम्पों के पानी का परीक्षण किया। उनके अनुसार पानी में यूरेनियम की उपलब्धता के मामले में सबसे ज्यादा खतरनाक स्थिति मंसा जिले की है। अध्ययन के अनुसार मिट्टी के नमूनों में भी यूरेनियम, रेडियम, थोरियम और पोटेशियम की मात्रा का स्तर भी काफ़ी उँचा पाया गया है। मेहरा कहते हैं “ऐसा सम्भवतः भटिंडा इलाके की तोशाम पहाड़ियों से आ रही मिट्टी के कारण हो सकता है, लेकिन इस सम्बन्ध में निष्कर्ष निकालने लिये और शोध तथा अध्ययन करने पड़ेंगे…”

इस समस्या ने परमाणु ऊर्जा वैज्ञानिकों का ध्यान भी आकर्षित किया और उन्होंने इलाके के पानी और मिट्टी का परीक्षण किया तथा बच्चों के विभिन्न मेडिकल टेस्ट भी किये। गुरुनानक देव विश्वविद्यालय के वरिष्ठ जियोफ़िजिसिस्ट डॉ सुरिन्दर सिंह बताते हैं, पहले भी पंजाब के मालवा इलाके के भूजल और सतह जल दोनों में रासायनिक परीक्षण में यूरेनियम की मात्रा मानक से ज्यादा स्तर पर पाई गई थी, इसलिये बच्चों के बालों में यूरेनियम का पाया जाना खतरे की घण्टी तो है, लेकिन यह अनपेक्षित नहीं है। वे आगे कहते हैं, पूर्व में किये गये विभिन्न अध्ययनों के अनुसार भटिण्डा जिले में पीने के पानी में यूरेनियम की सान्द्रता 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक पाई जा चुकी है, जबकि वैज्ञानिकों के अनुसार पानी में यूरेनियम का मानक स्तर 9 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से अधिक नहीं होना चाहिये।

पंजाब सरकार पंजाब के विभिन्न इलाकों में 200 रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) संयंत्र लगाने की योजना बना रही थी। रिवर्स ओस्मोसिस एक प्राकृतिक लेकिन वैज्ञानिक प्रक्रिया होती है जिससे पानी में भारी धातुओं की उपस्थिति को कम किया जाता है। इस प्रक्रिया के द्वारा जल को प्रदूषण मुक्त करके उपयोग करने लायक बनाया जाता है। लेकिन अब पंजाब के मालवा इलाके, खासकर भटिंडा, फ़रीदकोट, मंसा, संगरूर, मुक्तसर और मोगा आदि यूरेनियम वाले इलाकों में यह योजना बेमानी हो गई है। अन्य हेवी मेटल्स (जैसे आर्सेनिक, क्रोमियम, लौह, आदि) की तरह यूरेनियम को आरओ से निष्क्रिय नहीं किया जा सकता। अब अन्य किसी वैकल्पिक योजना पर काम करना पड़ेगा।

अपंग होते बच्चे


फरीदकोट के छोटे से इलाके में बच्चों में शारीरिक विकृतियां देखी जा सकती हैं जैसे-बड़ा सिर, फूली हुई आंखें, मुड़े हाथ और मुड़े पैर। इन असमान्यताओं की जांच के लिए पिछले दिनों बच्चों के बालों के सैंपल साउथ अफ्रीकी टॉक्सिकॉलजिस्ट डॉ. करीन स्मिट की पहल पर जर्मन लैब में भेजे गए थे। पर हाल ही में मिली लैब रिपोर्टों से पता लगा है कि शारीरिक गड़बड़ी की वजह असल में यूरेनियम की उच्च मात्रा होना है।

फरीदकोट के बाबा फरीद सेंटर फॉर स्पेशल चिल्ड्रेन के हेड पृथपाल सिंह कहते हैं, 'टेस्ट नतीजों से हम हैरान हैं क्योंकि पंजाब में यूरेनियम का कोई ज्ञात स्त्रोत नहीं है। यूरेनियम की बात उजागर होने पर अब जर्मन और साउथ अफ्रीकी डॉक्टरों की मदद से 150 अन्य प्रभावित बच्चों पर टेस्ट किए जा रहे हैं। इस बात की पड़ताल की जा रही है कि क्या यूरेनियम कहीं से रिसाव के कारण आया है या इसका स्त्रोत प्राकृतिक है।'

टेस्ट के सिलसिले में अपनी सहयोगी डॉ. वेरिर ड्रिर के साथ यहां आए जोहानिसबर्ग से टॉक्सिकॉलजिस्ट डॉ. स्मिट के मुताबिक, 'जब मैंने पहली बार ब्रेन डैमिज के इतने बड़े पैमाने पर सबूत देखे तो मुझे लगा कि ऐसा जहर के कारण हो रहा है। यूरेनियम के बारे में तो मैंने कतई सोचा भी नहीं था। पर डॉ. स्मिट की कोशिशों से जर्मन लैब में सच सामने आ गया।

डॉ. स्मिथ ने कहा कि यूरेनियम के असर से बच्चों को मुक्त करने के लिए डीटॉक्सीफिकेशन किया जाना जरूरी है। यह तभी संभव है जब भारत और पंजाब सरकार के अलावा समाजसेवी संस्थाएं भी आगे आएं। यूरेनियम से मुक्ति दिलाने के लिए हर बच्चे पर 3 से 6 लाख रुपए खर्च आएगा।

उन्होंने कहा कि भारतीय मंदबुद्धि बच्चों के बालों में यूरेनियम के अंश मौजूद होने का तो पता चल गया है लेकिन इसका असर शरीर के दूसरे हिस्सों पर कितना है, इसका पता करना भी जरूरी है। जिसके लिए सभी बच्चों के टेस्ट एकत्र कर लिए हैं जो जर्मनी की ‘माइक्रो ट्रेस मिनरल लेबोरेट्री’ को भेजे जा रहे हैं ।
साभार - दैनिक भास्कर

तुम कौन हो, इज्जत लुट गई तो क्या हुआ?










तुम
कौन हो
तुम्हारी अहमियत क्या है
तुम्हारी खबर क्यों छापें
क्यों दिखाएं अपने चैनल पर
तुम्हारी बेटी की इज्जत
लुट गई तो क्या हुआ
गलती तुम्हारी ही है
क्यों रहते हो झुग्गी में
क्यों नहीं है उसमें मजबूत दरवाजा
दरवाजा नहीं होगा तो
कोई कोई घुस ही जाएगा
क्या तुम्हारे पास घटना की
कोई लाइव या स्टिल फोटो है
नहीं तो इसमें बिकने लायक क्या है
लोग इसे क्यों देखेंगे
उन्हें इस खबर में क्या थ्रिल मिलेगा
तुम्हारी बेटी की इज्जत तो लुट गई
पर बिना मसाले के खबर नहीं बनेगी
ही इस पर आएगा एसएमएस
जिससे होती है कमाई
बुरा मत मानना
आखिर टार्गेट रीडर या दर्शक
का भी खयाल रखना है
अगली बार जब भी कुछ
ऐसा हो तो प्लीज कैमरे की
व्यवस्था जरूर करना
नहीं तो हमें खबर कर देना
हमारे फोटोग्राफर पहुंच जाएंगे
तुम्हें भी मिलेगा इसका लाभ
पब्लिसिटी मिलेगी
हमारी खूबसूरत एंकर रिपोर्टर
पूछेगी तुम्हारी बेटी से सवाल
कैसे हुआ था बलात्कार
उस समय
तुम्हें कैसा महसूस हो रहा था?
साभार -- बेबाक में श्री मृत्युंजय कुमार जी

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