विमान दुर्घटना में नेताजी की मौत को नकारते आठ सबूत

क्या नेहरू जी के शव के पास खड़े यह सन्यासी नेताजी सुभाष चंद्र बोस है?

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु के सम्बन्ध में कोई कहता है कि 18 अगस्त 1945 को नेताजी विमान दुर्घटना में मर गये, कुछ लोगों का कहना है कि वो छिपे हुये हैं। वस्तुतः स्थिति क्या है, इस सम्बन्ध में दृढ़तापूर्वक कोई नहीं कह सकता, लेकिन नीचे दिये गये तथ्यों के आधार पर यह अवस्य कहा जा सकता है कि 18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में नेता जी की मृत्यु नहीं हुई।

1. आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च अधिकारी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सन् 1999 तक राष्ट्र सघ के यु़द्ध अपराधी क्यों घोषित किये गये? यदि 1945 में मर चुके थे तो उसके बाद 1999 तक युद्ध अपराधी मानना अपने आप में षक पैदा करता है।

2. सन् 1947 के आजादी के समझोते के गुप्त दस्तावेज तथा फाईल आई एन ए नं. 10 पेज नं. 279 को अध्ययन करने से पता चलता है कि 18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में नेता जी की मृत्यु नहीं हुई।

3. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की कथित मृत्यु की घोषणा के उपरान्त नेहरु जी ने सन् 1956 में शाहनवाज कमेटी तथा इन्दिरा गांधी ने 1970 में खोसला आयोग द्वारा जांच करवाई तथा दोनों रिर्पोटों में नेताजी को मृत घोषित किया गया, लेकिन 1978 में मोरारजी देसाई ने इन रिर्पोटों को रद्द कर दिया। तथा राजग सरकार ने भी मुखर्जी आयोग की स्थापना कर पुनः इस प्रष्न का उत्तर तलाषने का प्रयास किया था। लेकिन मुखर्जी आयोग द्वारा जांच रिपोर्ट को वर्तमान कांग्रेस सरकार ने मानने से ही इंकार कर दिया। इस जांच रिपोर्ट में जापान सरकार द्वारा जापान में 18 अगस्त 1945 को कोई दुर्घटना होने की बात को सिरे से खारिज करना इस सन्देह को सच्चाई में बदलता है कि नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को नहीं हुई।

4. सन् 1948 में विजय लक्ष्मी राजदूत ने रुस से वापिस आकर मुम्बई शा न्ताक्रुज़ हवाई अड्ड़े से उतरते ही पत्रकारों के सामने कहा कि मैं भारत की जनता को ऐसा शुभ समाचार देना चाहती हूँ जो भारत की स्वतन्त्रता से बढ़कर ख़ुशी का समाचार होगा परन्तु नेहरु जी ने इस समाचार को जनता तथा पत्रकारों को देने से इन्कार कर दिया क्योंकि वह समाचार नेताजी से रुस में मुलाकात होने का संदेष था।

5. भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 4 अगस्त 1997 को दिये गये निर्णय के अनुसार 'नेताजी के नाम के साथ मरणोपरान्त षब्द रद्द किया जाता है।' क्या यह सिद्ध नहीं होता कि नेताजी की मृत्यु नहीं हुई ।

6. सेना मुख्याल्य द्वारा आयोजित 1971 की लड़ाई का विजय दिवस का सीधा प्रसारण 16 दिसम्बर 1997 को दिल्ली दूरदर्षन पर सांय 5-47 बजे से लेकर 7-00 बजे तक किया गया जिसमें बताया गया कि 8 दिसम्बर 1971 को भारतीय सेना और मुक्ति वाहिनी सेना की कमान एक बाबा संभाले हुये थे। दो दो सेनाओं की कमान सम्भालने वाला आखिर यह बाबा कौन था। सरकार इस बाबा का रहस्योदघाटन करे।

7. 28 मई 1964 को प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरु की मृत्यु पर बनी सरकारी डाक्यूमैन्टरी फिल्म के लास्ट चैप्टर की फिल्म नं. 816 बी जिसमें साधु के वेष में नेता जी दिखाई दे रहे हैं।

8. नेताजी की तथाकथित मृत्यु 18.08.1945 के बाद मंचुरिया रेड़ियो स्टेशन से 19.12.1945, 19.01.1946, 19.02.1946 को नेता जी द्वारा राष्ट्र के नाम दिये गये सन्देश क्या यह साबित नहीं करते हैं कि नेताजी की मृत्यु का समाचार गलत है।

उपरोक्त तथ्यों को देखते हुये तो हम यह ही कह सकते हैं कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जो कि रहस्यमयी तरीके से रहे, रहस्यमयी तरीके से अंग्रेजों की जेल से निकले, रहस्यमयी तरीके से लड़ाई लड़ी, और रहस्यमयी तरीके से ही अदृष्य होकर आज भी रहस्य बने हुये हैं।

दिख सकता है एक और सूरज, रातें भी बनेंगी दिन


साल 2012 तक ऐसा कुछ हो सकता है जिसकी कल्पना शायद आपने न की हो। हो सकता है, किसी दिन अचानक आपको दिन ज्यादा रोशन लगने लगे, रात को चांद के साथ सूरज भी चमकता दिखे, और तो और रोज सुबह सूरज देखकर दिन शुरू करने वाले या उसे जल चढ़ाने वाले भी आसमान में दो सूरज देखकर कनफ्यूज हो जाएं। ऐसा हो सकता है, अगर अब तक की सबसे बड़ी सनसनी, वैज्ञानिकों की यह भविष्यवाणी सही साबित हो गई।
ब्रिटिश अखबार डेली मेल के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया की सदर्न क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के सीनियर लेक्चरर ब्रैड कार्टर ने दावा किया है कि यूनिवर्स के सबसे चमकदार तारों में से एक बीटलगेस तारा अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। यह जल्दी ही एक बड़े विस्फोट के बाद सुपरनोवा में तब्दील होकर खत्म हो जाएगा। इससे धरती पर रोशनी की बारिश होगी और इस शानदार लाइट वर्क से धरती पर रातें भी सूरज की रोशनी से नहाई होंगी। यह नजारा एक दिन नहीं, दो दिन नहीं, बल्कि पूरे दो हफ्ते तक रह सकता है।

नेताजी सुभाष चंद बोस को नमन


भारत की आजादी की लड़ाई के सबसे महान नायकों में से एक नेताजी सुभाष चंद बोस का जन्म 1897 में आज ही के दिन हुआ था। जहां एक तरफ कांग्रेस टुकड़ों में आजादी पाने की बात करती थी, वहीं नेता जी जल्दी से जल्दी पूर्ण स्वतंत्रता के पक्षधर थे। उन्हें लगता था कि गांधी जी के अहिंसा सिद्धांत से आजादी नहीं मिल सकती।

दूसरे विश्व युद्ध में उन्होंने ब्रिटेन और दूसरी पश्चिमी ताकतों के खिलाफ इंडियन नैशनल आर्मी का नेतृत्व किया। वह दो बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे, लेकिन गांधी जी से मतभेद के चलते उन्होंने अपना पद छोड़ दिया। माना जाता है कि 1945 में उनका देहांत हो गया।
- तुम मुझे मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा। - अगर दुनिया में सबसे बड़ा कोई अपराध है तो वह है अन्याय और गलत चीजों के साथ समझौता करना। - सच्चा सिपाही वह है जिसे मिलिट्री के साथ-साथ स्प्रिचुअल ट्रेनिंग भी दी गई हो। - हो सकता है कि किसी विचार की खातिर किसी की जान चली जाए, लेकिन उसकी मौत के बाद उसका वही विचार हजारों दूसरे लोगों के दिलों में पैदा होगा। विचार और सपने एक जगह से दूसरी जगह और एक देश से दूसरे देश इसी तरह फैलते हैं।
- आजादी दी नहीं जाती, आजादी छीनी जाती है। - इतिहास गवाह है, दुनिया में कोई बड़ा बदलाव सिर्फ बातचीत से कभी नहीं आया। - आज हमारी एक इच्छा जरूर होनी चाहिए। इच्छा मरने की, ताकि भारत जी सके। हमारे अंदर ताकत होनी चाहिए एक शहीद की मौत का सामना करने की, ताकि उसके खून से आजादी की कहानी लिखी जा सके।

गल रोटियां दी जदों चलाइए, खाण नूं बारूद मिलदा


बंतसिंह एक ऐसा नाम, जिसके कंठ से गीत फूटते ही सुनने वाले के तन मन में सिहरन सी दौड़ जाती है। कुहनियों से काट दिए गए हाथों और घुटनों से नीचे तोड़ दिए गए पांवों वाला एक कद्दावर इंसान। गंभीर चेहरा और दमदार आवाज। अत्याचारियों को नेस्तनाबूद कर देने का आह्वान। बंतसिंह कहते हैं कि दुश्मनों ने हाथ-पांव ही तो काटे हैं, मेरा हौसला थोड़े ही खत्म किया है। मेरी जुल्म से लडऩे की ताकत तो दुबारा से अंकुरित होकर लहलहा रही है।
बंतसिंह जहां भी जाते हैं, ऊंची आवाज में हेक लगाते हैं -असीं जड़ ना जुल्म दी छड्डणी, साडी भावेंं जड़ ना रहे। लोक वे मरजाण ओ चंदिरियां मांवां जिनां ने समराज जम्मेआ। गल रोटियां दी जदों चलाइए, खाण नूं बारूद मिलदा। यानी हम जुल्म की जड़ को मिटाकर ही दम लेंगे। भले ही हमारी अपनी जड़ क्यों न मिट जाए। वे मांएं इस धरती पर क्या कर रही हैं, जिन्होंने अत्याचारियों को जन्म दिया है। हम जब भी कुछ खाने को मांगते हैं, वे हमारी थाली में रोटी देने के बजाय बारूद परोस देते हैं।
पंजाब के मानसा जिले के गांव चब्बर में मनिहार का काम करने वाले बंतसिंह गांव-गांव में घूमते और जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाते। निर्धन, पीडि़त और दलितों में आत्मसम्मान का भाव जगाते।

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