
24 सितंबर एक टर्निग प्वॉइंट

अयोध्या विवाद पर फैसला आने से पहले फ्रांस के एक लेखक ने कहा है कि अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से राजीव गांधी जिम्मेदार थे। उन्होंने यह भी कहा है कि यह फैसला मुस्लिमों को मुख्यधारा में लाने का एक अच्छा मौका है। पेरिस में दक्षिण एशियाई राजनीति एवं इतिहास पढ़ाने वाले डॉ. क्रिस्टॉफ जैफ्रेलो ने अपनी पुस्तक रिलिजन, कास्ट एंड पॉलिटिक्स इन इंडिया में कहा है कि अयोध्या का विवादित ढांचा गिराए जाने के पीछे राजीव गांधी की अप्रत्यक्ष भूमिका थी क्योंकि वह हिंदू और मुसलमान समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ लड़ाने की कोशिश करते थे। उन्होंने कहा है, शाहबानो मामले से लेकर विश्व हिंदू परिषद के कहने पर विवादित ढांचे का ताला खुलवाने और फैजाबाद को राम की भूमि कहते हुए अपना चुनाव प्रचार शुरू करने तक वह हिंदुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर रहे थे। उन्होंने अपनी पुस्तक में यह भी कहा है कि यह फैसला भारतीय नेतृत्व के लिए मुसलमानों को फिर से मुख्यधारा में लाने का मौका होगा। भारत के इतिहास में 24 सितंबर एक टर्निग प्वॉइंट साबित होगा। उनका मानना है कि मेल-मिलाप के प्रयास होने चाहिए और हिंदूवादी ताकतों की ओर से यह पहल होनी चाहिए। उनके अडि़यल रवैये से मुश्किलें ही आएंगी। जैफ्रेलो ने कहा कि भगवा ब्रिगेड को मुस्लिमों की खिलाफत करने से पहले दो बार सोचना पड़ेगा क्योंकि 2009 के लोकसभा चुनाव में भारतीय मध्य वर्ग का रुख उनके खिलाफ था। मुसलमानों के बाबत उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ फैसले का आना दोधारी तलवार जैसा होगा क्योंकि वे इसे बार-बार पराजय स्वीकार करने के रूप में देख सकते हैं।
तो यह है राम जन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद का इतिहास

अयोध्या में सदियों से चले आ रहे राम जन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद के ऐतिहासिक विवाद का वर्तमान अध्याय 22-23 दिसंबर, 1949 को मस्जिद के अंदर कथित तौर पर चोरी - छिपे मूर्तियां रखने से शुरू हुआ था.
शुरूआती मुद्दा सिर्फ़ ये था कि ये मूर्तियां मस्जिद के आँगन में क़ायम कथित राम चबूतरे पर वापस जाएँ या वहीं उनकी पूजा अर्चना चलती रहे.
मगर 60 साल के लंबे सफ़र में अदालत को अब मुख्य रूप से ये तय करना है कि क्या विवादित मस्जिद कोई हिंदू मंदिर तोड़कर बनाई गई थी और क्या विवादित स्थल भगवान राम का जन्म स्थान है?
वैसे तो हाईकोर्ट को दर्जनों वाद बिंदुओं पर फ़ैसला देना है, लेकिन दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा ये है कि क्या विवादित इमारत एक मस्जिद थी, वह कब बनी और क्या उसे बाबर अथवा मीर बाक़ी ने बनवाया?
इसी के साथ कुछ तकनीकी या क़ानूनी सवाल भी हैं. मसलन क्या जिन लोगों ने दावे दायर किए हैं , उन्हें इसका हक़ है? क्या उन्होंने उसके लिए ज़रुरी नोटिस वग़ैरह देने की औपचारिकताएँ पूरी की हैं और क्या ये दावे क़ानून के तहत निर्धारित समय सीमा के अंदर दाख़िल किए गए?
अदालत को ये भी तय करना है कि क्या इसी मसले पर क़रीब सवा सौ साल पहले 1885 – 86 में अदालत के ज़रिए दिए गए फ़ैसले अभी लागू हैं.
उस समय हिंदुओं की पंचायती संस्था निर्मोही अखाड़ा ने मस्जिद से सटे राम चबूतरे पर मंदिर बनाने का दावा किया था, जिसे अदालत ने यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया था कि ऐसा होने से वहाँ रोज़- रोज़ सांप्रदायिक झगड़े और ख़ून- ख़राबे का कारण बन जाएगा.
अदालत ने ये भी कहा था कि हिंदुओं के ज़रिए पवित्र समझे जाने वाले स्थान पर मस्जिद का निर्माण दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन अब इतिहास में हुई ग़लती को साढ़े तीन सौ साल बाद ठीक नही किया जा सकता.
मामले को हल करने के लिए सरकारों ने अनेकों बार संबंधित पक्षों की बातचीत कराई, लेकिन कोई निष्कर्ष नही निकला. लेकिन बातचीत में मुख्य बिंदु यह बन गया कि क्या मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई अथवा नही.
सुप्रीम कोर्ट ने भी 1994 में इस मामले में अपनी राय देने से इनकार कर दिया कि क्या वहाँ कोई मंदिर तोड़कर कोई मस्जिद बनाई गई थी.
गेंद अब हाईकोर्ट के पाले में है. मसला तय करने के लिए अदालत ने ज़ुबानी और दस्तावेज़ी सबूतों के अलावा पुरातात्विक खुदाई करवाकर एक रिपोर्ट भी हासिल कर ली है, जिसमें मुख्य रूप से ये कहा गया है कि विवादित मस्जिद के नीचे खुदाई में मंदिर जैसी एक विशाल इमारत , खम्भे , एक शिव मंदिर और कुछ मूर्तियों के अवशेष मिले हैं.
लेकिन मुस्लिम पक्ष ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की इस रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति करते हुए उसे सबूतों में शामिल न करने की बात कही है, जबकि हिंदू पक्ष इस रिपोर्ट के अपने दावे की पुष्टि में प्रमाण मानते हैं.
अदालत में मुख्य रूप से चार मुक़दमे विचाराधीन हैं, तीन हिंदू पक्ष के और एक मुस्लिम पक्ष का. लेकिन वादी प्रतिवादी कुल मिलाकर मुक़दमे में लगभग तीस पक्षकार हैं.
सरकार मुकदमे में पक्षकार है, लेकिन उसकी तरफ़ से कोई अलग से पैरवी नही हो रही है. सरकार की तरफ़ से शुरुआत में सिर्फ़ ये कहा गया था कि वह स्थान 22/ 23 दिसंबर 1949 तक मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होती रही है.
इसी दिन मस्जिद में मूर्तियाँ रखने का मुक़दमा भी पुलिस ने अपनी तरफ़ से क़ायम करवाया था, जिसके आधार पर 29 दिसंबर 1949 को मस्जिद कुर्क करके ताला लगा दिया गया था.
इमारत तत्कालीन नगरपालिका अध्यक्ष प्रिय दत्त राम की सुपुर्दगी में दे दी गई और उन्हें ही मूर्तियों की पूजा आदि की ज़िम्मेदारी भी दे दी गई.
आरोप हैं कि तत्कालीन ज़िला मजिस्ट्रेट केके नैयर भीतर- भीतर उन लोगों का साथ दे रहे थे, जिन्होंने मूर्तियाँ मस्जिद के अंदर रखीं. इसीलिए उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के कहने के बावजूद मूर्तियां नहीं हटवाईं.
जनवरी 16, 1950 को हिंदू महासभा के एक कार्यकर्ता गोपाल सिंह विशारद ने सिविल कोर्ट में ये अर्ज़ी दायर की कि मूर्तियों को वहाँ से न हटाया जाए और एक राम भक्त के रूप में उन्हें वहाँ पूजा अर्चना की अनुमति दी जाए.
सिविल कोर्ट ने ऐसा ही आदेश पारित कर दिया. अदालत ने पूजा आदि के लिए रिसीवर की व्यवस्था भी बहाल रखी. इस मुक़दमे में सरकार को नोटिस देने की औपचारिकता पूरी नही की गई थी. संभवतः इसीलिए कुछ दिन बाद ऐसा ही एक और दावा दिगंबर अखाड़ा के राम चंद्र दास परमहंस ने दायर किया, जो उन्होंने बाद में 1989 में वापस ले लिया.
फिर 1959 में हिंदुओं की पंचायती संस्था निर्मोही अखाड़ा ने अदालत में तीसरा मुक़दमा दर्ज करके कहा कि उस स्थान पर सदा से राम जन्म स्थान मंदिर था और वह निर्मोही अखाड़ा की संपत्ति है, इसलिए रिसीवर हटाकर इमारत उसे सौंप दी जाए.
निर्मोही अखाड़ा का तर्क है कि मंदिर को तोड़ने के प्रयास किए गए पर वह सफल नही हुए और हिंदू वहाँ हमेशा पूजा करते रहे. उनका यह भी कहना है कि 1934 के दंगों के बाद मुसलमानों ने डर के मारे वहाँ जाना छोड़ दिया था, और तब से वहाँ नमाज़ नही पढ़ी गई. इसलिए हिंदुओं का दावा पुख़ता हो गया.
दो साल बाद सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड और कुछ स्थानीय मुसलमानों ने चौथा मुक़दमा दायर करके कहा कि बादशाह बाबर ने 1528 में यह मस्जिद बनवाई थी और 22/ 23 दिसंबर, 1949 तक यह मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होती रही है. इतने लंबे समय तक उनका कब्ज़ा रहा. इसे मस्जिद घोषित कर उन्हें क़ब्जा दिलाया जाए.
मुस्लिम पक्ष का तर्क है कि निर्मोही अखाड़ा ने 1885 के अपने मुक़दमे में केवल राम चबूतरे पर दावा किया था, न कि मस्जिद पर और वह अब उससे पलट नही सकता. मुस्लिम पक्ष का कहना है कि अदालत का तत्कालीन फ़ैसला अब भी बाध्यकारी है.
मुस्लिम पक्ष राम चबूतरे पर हिंदुओं के क़ब्ज़े और दावे को स्वीकार करता है.
मुस्लिम पक्ष तर्क में यह तो मानता है कि वर्तमान अयोध्या वही अयोध्या है जहां राम चन्द्र जी पैदा हुए, लेकिन बाबर ने जहाँ मस्जिद बनवाई, वह ख़ाली जगह थी.
क़रीब चार दशक तक यह विवाद अयोध्या से लखनऊ तक सीमित रहा. लेकिन 1984 में राम जन्म भूमि मुक्ति यज्ञ समिति ने विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सहयोग से जन्म भूमि का ताला खोलने का ज़बरदस्त अभियान चलाकर इसे राष्ट्रीय मंच पर ला दिया. इस समिति के अध्यक्ष गोरक्ष पीठाधीश्वर हिंदू महासभा नेता महंथ अवैद्य नाथ ने और महामंत्री कांग्रेस नेता तथा उत्तर प्रदेश सरकार में पूर्व मंत्री दाऊ दयाल खन्ना इसमें शामिल थे.
एक स्थानीय वकील उमेश चंद्र पाण्डे की दरख़ास्त पर तत्कालीन ज़िला जज फ़ैज़ाबाद के एम पाण्डे ने एक फऱवरी 1986 को विवादित परिसर का ताला खोलने का एकतरफ़ा आदेश पारित कर दिया, जिसकी तीखी प्रतिक्रिया मुस्लिम समुदाय में हुई.
इसी की प्रतिक्रिया में फ़रवरी, 1986 में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन हुआ और मुस्लिम समुदाय ने भी विश्व हिंदू परिषद की तरह आन्दोलन और संघर्ष का रास्ता अख़्तियार किया.
ताला खोलने के आदेश के ख़िलाफ़ मुस्लिम समुदाय की अपील अभी भी कोर्ट में लंबित है.
मामले में एक और मोड 1989 के आम चुनाव से पहले आया जब विश्व हिंदू परिषद के एक नेता और रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने एक जुलाई को भगवान राम के मित्र के रूप में पांचवां दावा फ़ैज़ाबाद की अदालत में दायर किया.
इस दावे में स्वीकार किया गया कि 23 दिसंबर 1949 को राम चबूतरे की मूर्तियाँ मस्जिद के अंदर रखी गईं. दावा किया गया कि जन्म स्थान और भगवान राम दोनों पूज्य हैं और वही इस संपत्ति के मालिक.
इस मुक़दमे में मुख्य रूप से ज़ोर इस बात पर दिया गया है कि बादशाह बाबर ने एक पुराना राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाई. दावे के समर्थन में अनेक इतिहासकारों, सरकारी गज़ेटियर्स और पुरातात्विक साक्ष्यों का हवाला दिया गया है.
यह भी कहा गया कि राम जन्म भूमि न्यास इस स्थान पर एक विशाल मंदिर बनाना चाहता है. इस दावे में राम जन्म भूमि न्यास को भी प्रतिवादी बनाया गया. श्री अशोक सिंघल इस न्यास के मुख्य पदाधिकारी हैं.
इस तरह पहली बार विश्व हिंदू परिषद भी परोक्ष रूप से पक्षकार बना.
याद रहे कि राजीव गांधी ने 1989 में अपने चुनाव अभियान का श्रीगणेश फ़ैज़ाबाद में जन सभा कर राम राज्य की स्थापना के नारे के साथ किया था. चुनाव से पहले ही विवादित मस्जिद के सामने क़रीब दो सौ फुट की दूरी पर वीएचपी ने राम मंदिर का शिलान्यास किया, जो कांग्रेस से मुस्लिम समुदाय की नाराज़गी का कारण बना.
विश्व हिंदू परिषद ने 1989 में शिलान्यास से पूर्व इस मामले में कोर्ट आदेश के पालन की बात कही थी, पर अब वह संसद में कानून बनाकर मामले को हल करने की बात करती है, क्योंकि उसके मुताबिक़ अदालत आस्था के सवाल पर फ़ैसला नही कर सकती.
निर्मोही अखाड़ा और विश्व हिंदू परिषद अदालत की लड़ाई में एक दूसरे के विरोधी हैं.
जगदगुरु स्वामी स्वरूपानंद की राम जन्म भूमि पुनरुद्धार समिति भी 1989 में इस मामले में प्रतिवादी बनी. उनका दावा है कि पूरे देश के सनातन हिंदुओं का प्रतिनिधित्व यही संस्था करती है. उसके तर्क निर्मोही अखाड़ा से मिलते जुलते हैं.
हिंदुओं की दो और संस्थाएं हिंदू महासभा और आर्य प्रादेशिक सभा भी प्रतिवादी के रूप में इस स्थान पर सदियों से राम मंदिर होने का दावा करती हैं.
इनके अलावा सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने कई अन्य हिंदुओं को उनकी निजी हैसियत से भी प्रतिवादी बनाया हैं. इनमे हनुमान गढ़ी के धर्मदास प्रमुख हैं. धर्मदास और निर्मोही अखाड़ा की पुरानी लड़ाई है और वह विश्व हिंदू परिषद के क़रीब हैं.
निर्मोही अखाड़ा ने कई स्थानीय मुसलमानों को प्रतिवादी बनाया है. मुसलमानों की ओर से सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड मुख्य दावेदार है. सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने हाशिम अंसारी समेत कई स्थानीय मुसलमानों को अपने साथ पक्षकार बनाया है.
उसके अलावा जमीयत-ए-उलेमा हिंद, शिया वक़्फ़ बोर्ड, आल इण्डिया शिया कांफ्रेंस संस्थागत रूप से प्रतिवादी हैं. मुस्लिम पक्षों का सबका दावा लगभग एक जैसा है सिवा आल इण्डिया शिया कांफ्रेंस के जिसने पहले यह कहा था कि अगर मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात साबित हो जाए तो मुलिम अपना दावा छोड़ देंगे.
शुरू में इस मुक़दमे में कुल 23 प्लाट शामिल थे, जिनका रक़बा बहुत ज़्यादा था. लेकिन छह दिसंबर को विवादित मस्जिद ध्वस्त होने के बाद 1993 में केंद्र सरकार ने मामला हल करने और मंदिर मस्जिद दोनों बनवाने के लिए मस्जिद समेत 70 एकड़ ज़मीन अधिग्रहित कर ली.
ज़मीन अधिग्रहण क़ानून को वैध ठहराते हुए 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को अब केवल उस स्थान का मालिकाना हक़ तय करना है जहाँ पर विवादित मस्जिद थी.
इस तरह अब मात्र क़रीब आधा बिस्वा ज़मीन का मुकदमा बचा है. जीतने वाले पक्ष को अगल-बग़ल की अधिग्रहीत भूमि ज़रुरत के मुताबिक मिलेगी.
कहने को यह आधा बिस्वा ज़मीन का मामला है लेकिन करोड़ों हिंदुओं और मुसलमानों की भावनाएं अब इससे जुड़ गई हैं. अदालत और समूची न्यायपालिका की प्रतिष्ठा इससे जुडी है. अदालत के फ़ैसले को लागू कराना सरकार का दायित्व होगा.
इसलिए सब मिलाकर यह मामला पूरे भारतीय समाज और संवैधानिक-लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए चुनौती बन गया है।
रामदत्त त्रिपाठी, बीबीसी संवाददाता
शहीद की मां बोली, नेता ही करते हैं टॉर्चर

जंग में लड़ते हैं सिपाही, सुर्खरू होते हैं जिल्लेइलाही। कारगिल युद्ध में अपनी जान न्यौछावर करने वाले शहीदों के परिजनों के हालात उपरोक्त पक्तियां बखूबी बयां करती हैं। इकलौते बेटे को मरणोपरांत शौर्य चक्र न मिलने से कारगिल के शहीद राइफलमैन सुनील जंग महत की मां आहत हैं। शौर्य चक्र के लिए लगातार दिल्ली निजाम में दस्तक देने वाली मां सरकारी रवैये से विचलित जरूर हैं, लेकिन लड़ाई लड़ने का संकल्प बरकरार है। जबकि लांस नायक केवलानंद द्विवेदी की विधवा कमला देवी चार साल पहले सरकारी क्वार्टर छोड़ कर गुमनामी की जिंदगी जी रही हैं। इन सूरमाओं के शहादत दिवस पर नेता और अधिकारी प्रतिमाओं पर माला चढ़ा अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। उन्हें इतनी भी फुर्सत नहीं कि शहीदों के परिजनों से मिल उनकी तकलीफ को समझ सकें।
कारगिल युद्ध में शहीद हुए २ राष्ट्रीय राइफल रेजीमेंट के मेजर विवेक गुप्ता को मरणोपरांत महावीर चक्र प्रदान किया गया। इनका परिवार कुछ साल पहले लखनऊ छोड़ कर अपने पैतृक शहर देहरादून चला गया। परिवार पहले उस्मान एन्क्लेव, अलीगंज में रह रहा था। जबकि शहीद कैप्टन आदित्य मिश्र के पिता ले. जनरल जी.एस. मिश्र सरकार और नेताओं पर बिना कुछ बोले ही अपनी व्यथा बयां कर देते हैं। शहीद कैप्टन मनोज पाण्डेय के पिता को पेट्रोल पंप, सरकारी आवास तो मिल गया, लेकिन शहीद के छोटे भाई मनमोहन पाण्डेय आज भी एक अदद स्थायी नौकरी के मोहताज हैं। वे अस्थायी तौर पर विधानसभा में असिस्टेंट मार्शल पद पर नौकरी कर रहे हैं। सूबेदार नर नारायण जंग चाहते थे कि उनका इकलौता बेटा सेना में बड़ा अधिकारी बन उनके सीने को चौड़ा कर दे। बेटे सुनील जंग को सेना की भर्ती के लिए तैयार करना शुरू कर दिया था। १९९५ में वह घड़ी भी आ गई, जब सुनील जंग सेना में बतौर राइफलमैन भर्ती हो गया। अभ्यास के बाद पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर के कारगिल सेक्टर में हुई। १९९९ में कारगिल युद्ध में पाक फौज के सिपाहियों को खदेड़ते हुए सुनील जंग वीरगति को प्राप्त हो गया। शहादत पर मां वीना महत खूब रोईं। शहादत के करीब एक साल तक अधिकारी, नेता और सामाजिक कार्यकर्ता नर नारायण जंग को हिम्मत देते रहे लेकिन वक्त बीतने के साथ सब कुछ वीरान होता चला गया। शहादत के ११ साल बाद स्थिति यह है कि उनके परिजनों का, बड़े नेता और अधिकारियों की बात तो दूर स्थानीय नेता भी दुख दर्द पूछने की जहमत नहीं उठाते। कारगिल विजय दिवस पर सेना और जिला प्रशासन ने याद कर लिया तो ठीक, नहीं तो अपने बेटे की तस्वीर देख कर मां वीना गर्वित हो जाती है।
४८ वर्षीय वीना महत अपने पल्लू से पावर के चश्मे को साफ करते हुए कुछ सोचती हैं, माथे पर शिकन आ जाती है। क्या बताऊं, मेरा एक ही बेटा था, बड़ा हैंडसम, खूबसूरत...। अपने पापा की तरह फौज में जाने के लिए उतावला था। जब वह ११ साल का था, तभी फौज में भर्ती होने की जिद पकड़ ली। बेटा सेना में भर्ती हुआ, पहली ही पोस्टिंग में दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए कारगिल में मोर्चा संभाला। ११ दिन तक मेरे बच्चे ने बर्फ खाकर दुश्मनों को नेस्तनाबूद कर दिया। कहते-कहते रुक जाती हैं वीना। एलबम निकाल कर फोटो दिखाती हैं और आंखों को साफ करती हैं, शायद उनकी आंखों में आंसू आ गए थे, जिसे वे जताना नहीं चाहती थीं।
दो कमरे के किराए वाले मकान में रह रहे वीना और उनके पति अपने दो बेटियों और दामाद के साथ गुजर-बसर कर रहे हैं। सरकार ने जंग की शहादत के बाद जीविका के लिए गैस एजेंसी का लाइसेंस दिया है। वीना महत खुद गोसाईंगंज स्थित गैस एजेंसी चला रही हैं, लेकिन लोगों की धमकियां उन्हें परेशान कर रही हैं। वे कहती हैं कि खास कर नेता उन्हें टार्चर कर रहे हैं। नेताओं के इस रवैये से दुखी वीना मजबूरी में परिवार की जीविका के लिए एजेंसी चला रही हैं। दुखी होकर अपने पति से अपने पुश्तैनी घर हिमाचल के धर्मशाला चलने को कहती हैं, लेकिन अब लखनऊ का तोपखाना बाजार उनसे छोड़ा नहीं जाता।
मुझे चैन से सोने देना
कब्र
मरने पर मेरे मुझे
सुपुर्दे ख़ाक कर देना
मेरी कब्र न बनाना
मुझे चैन से सोने देना.
नहीं चाहता खलल
नींद मे मेरी आये
ता उम्र उलझा रहा फिक्र मे
मर कर तो सकूँ आये.
मरने पर किसी के
जब फातिया पढ़ते हैं
चैन से सोने कि
सब दुआ करते हैं.
फिर क्यों कब्र किसी कि
वो बनाते हैं
कब्र पर इंसान नहीं
बस उल्लू नज़र आते हैं.
टूटे हुए पत्तों का ढेर
कब्र पर छा जाता है
जानने को हाल कोई
कब्र तक नहीं आता है.
मैं जिन्दा तो दबा रहा
फिक्रों के बोझ से
मरने पर न दबाना
मुझे पत्तों के बोझ से.
पत्तें भी तन्हां हैं
शाख से अपनी
सुपुर्दे ख़ाक कर देने
उनको भी कहीं.
चैन से सो जाएँ वे भी
तुम दुआ करना
उनके भी अमन कि खातिर
एक फातिया पढ़ना.
डॉ कीर्तिवर्धन
तेरी अदा

मोटी मोटी आँखें
रंग आँखों का काला
नागिन सी जुल्फें काली
नागिन सी जुल्फें काली
घटा सी भारी भारी
लहराती है कमर पर
जब चलती है तू इठलाकर
वों तेरा बातें करना
व़ो तेरा हंसना मुस्कुराना
रूठकर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराना
कर जाता है घायल
हो जाते हैं कायल
चलता है जब
इक तीर जिगर पर
जब देखती है तू आँखें मिचालाकारा
नहीं है ठीक सीने जिगर पर
नहीं है ठीक सीने जिगर पर
अंखियों का वार करना
तेरा बंद आँखों से सब कुछ कह जाना
कर जाता है घायल
तुम्हारा अपने आप में यूँ सिमट जाना
मगर जब
कहते हो बातें भी न करना
न हाल दर्दे दिल का सुनना
और न अपने दिल का हाल सुनाना
मार डालेगा ये बेरुखी का आलम तुम्हारा
ये है मोहन का मन
भोपाल नहीं, देश की सबसे बड़ी त्रासदी है
देश की सबसे बड़ी भोपाल गैस त्रासदी का एक और कड़वा सच सामने आया है। भोपाल के तत्कालीन डीएम मोती लाल सिंह ने खुलासा किया है कि सूबे की सरकार ने गैस त्रासदी के मुख्य आरोपी एंडरस को बचाने का पूरा प्रयास किया था। श्री सिंह ने कहा कि 7 दिसंबर 1984 की सुबह एंडरसन भोपाल आया था लेकिन उसी शाम को राज्य सरकार के भारी दबाव के चलते उसे चार्टर्ड प्लेन से वापस दिल्ली भेज दिया गया। सरकारें जनता की नहीं बल्कि धनवानों की जेब में हैं। यह हमेशा से होता रहा है की सरकार पूंजीपतियों से चंदा लेकर आम मजलूमों को भूल जाती है।
मोती लाल सिंह ने कहा कि उस समय राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और राज्य के मुख्य सचिव ब्रम्ह स्वरूप थे, जिनके दिशा निर्देश पर एंडरसन को पकड़कर छोड़ दिया गया और सही सलामत दिल्ली भेजा गया। उन्होंने राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि 7 दिसंबर को एंडरसन को पकड़कर विमान से भोपाल लाया गया था लेकिन उस दिन सचिव ब्रम्ह स्वरूप ने अपने कमरे में हमें बुलाकर यह निर्देश दिया कि एंडरसन को सही सलामत वापस भेजना है, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। सचिव ने कहा कि एंडरसन को भोपाल एयरपोर्ट से ही वापस भेजना है, जिसके बाद एक चार्टर्ड विमान की व्यवस्था करके उसे दिल्ली भेज दिया गया।
उन्होंने कहा कि एंडरसन प्रभावित क्षेत्र को देखना चाहते थे और पीड़ितों से मिलने के लिए वे काफी परेशान थे। वे बार-बार हमसे पूछ रहे थे कि यह हादसा कैसे हो गया। हमने उन्हें सारी बातें विस्तार से बताईं और कहा कि अब आप जल्द से जल्द भोपाल छोड़ दें और दोबारा यहां आने की कोशिश न कीजिएगा।
भोपाल गैस त्रासदी : दफन हुआ इंसाफ

25 साल पहले जिस भोपाल गैस कांड में हजारों लोग मारे गए थे और अनेकों लोग स्थायी रूप से विकलांग हो गए थे, उसके जिम्मेदार लोगों को सिर्फ दो साल की सजा और प्रत्येक पर एक लाख एक हजार 750 रुपए का जुर्माना लगाया गया है। सजा सुनाए जाने के कुछ मिनट बाद ही 25 हजार रुपए के मुचलके पर सात दोषियों को जमानत भी मिल गई। ऊपरी अदालत में अपील करने के लिए इनके पास 30 दिन का समय है।
और अब अदालत ने निकाले आंसू
भोपाल गैस पीड़ितों को इंसाफ दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे स्वयंसेवी संगठनों ने इसे बहुत देर से दी गई बहुत हल्की सजाया बताया और आरोप लगाया कि अभियोजन और सीबीआई ने इस मामले में पीड़ितों का पक्ष प्रभावी ढंग से नहीं रखा। भोपाल जिला अदालत ने सोमवार दोपहर गैस कांड के आरोपी केशव महेंद्रा सहित सात आरोपियों को दोषी मानते हुए सजा सुनाई।
* ‘हमारी कानूनी व्यवस्था पर सवाल है यह फैसला’
* ‘भोपाल’ में दिल्ली के लिए भी छिपा है सबक
* त्रासदी से फैसले तक का सफर
न्यायिक व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी!
अदालत ने यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड पर भी पांच लाख रुपए का जुर्माना किया है। फैसला सुनाए जाते वक्त महेंद्रा सहित पांच आरोपी अदालत में उपस्थित थे। सीजेएम मोहन पी तिवारी द्वारा अंग्रेजी में दिए गए 93 पृष्ठीय फैसले में फरार आरोपी यूनियन कार्बाइड कापरेरेशन के तत्कालीन चेयरमेन वारेन एंडरसन और गैरहाजिर चल रहीं दो कंपनियों कार्बाइड कापरेरेशन, कार्बाइड ईस्टर्न इंडिया (हांगकांग) का उल्लेख नहीं है। इस मामले में सीबीआई की ओर से सी. सहाय ने पैरवी की। इस मामले का एक आरोपी शकील अहमद कुरैशी फैसले के वक्त कोर्ट में मौजूद नहीं था। उनके वकील ने अदालत को बताया कि वह इंदौर में गंभीर रूप से बीमार है। उसे एंबुलेंस से भोपाल लाया जा रहा है। अदालत ने इस बात को मानकर शकील की अनुपस्थिति में ही फैसला सुना दिया, जबकि शाम 6 बजे तक शकील अदालत में पेश नहीं हुआ था।
छावनी में तब्दील रही अदालत:
एहतियात के तौर पर पुलिस ने जिला अदालत को छावनी में तब्दील कर रखा था। इससे यहां पेशी पर आए अन्य लोगों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ा। सीजेएम कोर्ट में भी जिन लोगों की पेशी थी, उन्हें अदालत के अंदर जाने नहीं दिया गया। कोर्ट का मुख्य प्रवेश द्वार सुबह दस बजे ही बंद करा दिया था। गेट नंबर एक के बाहर एक वज्र वाहन तैनात रहा।
गैस पीड़ित संगठन की प्रतिक्रिया:
भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के संयोजक अब्दुल जब्बार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में मुआवजा लेते समय जो समझौता हुआ था, उसमें मृतकों की संख्या तीन हजार से अधिक थी, यदि प्रत्येक व्यक्ति की मौत के लिए पांच हजार रुपए का जुर्माना किया जाता तो वह भी करोड़ों रुपए होता। उन्होंने कहा हैरत की बात है कि फैक्टरी के मालिक केशव महेंद्रा और फैक्ट्री के जो कर्मचारी आरोपी थे, उन सभी पर एक ही राशि का जुर्माना किया गया।
कितनी सजा
भादवि की धारा 304-ए : केशव महेंद्रा, विजय गोखले, किशोर कामदार, जे मुकुंद, एसपी चौधरी, केवी शेट्टी, एसआई कुरैशी को दो साल की जेल और एक लाख रुपए जुर्माना। इसी धारा में यूका पर पांच लाख रुपए का जुर्माना।
१. धारा 338 में केशव महेंद्र सहित सातों आरोपियों को एक साल की जेल और एक हजार का जुर्माना।
२. धारा 337 में केशव महेंद्रा सहित सातों आरोपियों को छह महीने की जेल और पांच सौ का जुर्माना।
३. धारा 336 में केशव महेंद्रा सहित सातों को तीन माह की जेल और प्रत्येक पर 250 रु. का जुर्माना।
इंतजार ही रहा न्याय
फैसला सुनने बड़ी संख्या में गैस पीड़ित महिलाएं और संगठनों के लोग पहुंचे थे, लेकिन पुलिस ने किसी को भी अदालत भवन में नहीं जाने दिया। विरोध पर पुलिस ने उनसे मारपीट की। गैस पीड़ितों का कहना था कि 25 साल से अपने हक की लड़ाई लड़ते-लड़ते लाठियां खाई। आज फैसले के दिन भी इसका शिकार होना पड़ा।
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साभार -दैनिक भास्कर
तेरा चेहरा...
बारिश की बूंदों में हम भी करते थे मस्ती
हम भी कभी इश्क किया करते थे

जब उसकी धुन में जिया करते करते थे,
हम भी चुपचाप पिया करते थे,
आँखों में प्यास हुआ करती थी,
दिल में तूफान उठा करते थे,
लोग आते थे हमसे गजल सुनने,
हम उनकी बातें किया करते थे,
सच समझते थे उनके वादों को,
दिन रात उसकी यादो में जिया करते थे,
सपनो में उससे मिलकर,
दिल में फूल खिला करते थे,
घर की दीवार सजाने की खातिर,
हम उसका नाम लिखा करते थे,
आज उन्हें देखकर फिर याद आया,
हम भी कभी इश्क किया करते थे.
हम भी कभी इश्क किया करते थे.
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