वाह रे पंचायत! सोचा, लड़की का क्या होगा?

मुजफ्फर नगर की पंचायत ने निम्न तबके वाली लड़की के हित में नहीं, बल्कि उच्च विरादरी के हक में फैसला सुनाया है । यह तो वही हुआ कि -- जबरा मारे, निबरा को रोने भी न दे । एसे में तो अमीरजादे कुछ भी करें, गरीब पैसा लेता रहे । यह कहां का कानून है ?
प्रेमी को देना पड़ेगा खर्चा , खबर यह नहीं बल्कि यह होनी चाहिए कि अब गरीब तबके की लड़की का क्या होगा ? भारतीए समाज में एसा कोई प्रावधान नहीं है,जिसमें गर्भवती लड़की को किसी और के खूंटे बांधा जाए । पंचायत का फैसला यह होना चाहिए कि गरीब लड़की के साथ अगर प्रेम किया गया है तो उसके प्रेमी के साथ विवाह होना चाहिए । यह कहां से उचित फैसला हुआ, कि गरीब को पैसा देकर मुंह बंद करवा दो । मैंने भी एक अखबार में इस खबर को देखा । एजैंसी के रिपोर्टर ने मसाला लगाकर खबरें प्रस्तुत की थीं, अखबार ने भी बढिया डिस्पले देकर पाठक तक पहुंचाया । लेकिन क्या सुबह इस खबर को पढ़ कर आपकी आत्मा ने कोई सवाल नहीं किया । अगर नहीं तो आप सो रहे हैं ?
बुरा मत मानना क्या गरीब लड़की की जगह आप में से किसी की लड़की होती, उच्च श्रेणी के लड़के की जगह आपके इलाके के किसी करोड़पति या फिर किसी बड़े नेता का लड़का होता, तब आप क्या करते । मान लो आपको कहा जाता कि १ करोड़ लेकर बेटी का गरभपात करवा लें, किसी के साथ ब्याह दें । क्या आप एसा करते ? जरा सोचिए ....
यह मुजफ्फर नगर की पंचायत का फाल्ट नहीं है, फाल्ट हमारे समाज का है । हमेशा से ही गरीबों को कुचला गया है, गरीब लड़कियों के चीरहरण किए गए हैं । वह चाहे मुंशी प्रेमचंद की कोई कहानी हो, अथवा कोई बड़े लेखक का जासूसी उपन्यास अथवा किसी बड़े डायरैक्टर की कोई फिल्म क्यों न हो ? आपने कहानी अमित जी के पोस्ट में पढ़ी होगी,कहानी मैं नहीं बताऊंगा । लेकिन इतना जरूर कहूंगा, कि सोचिए क्या यह ठीक है ।

डोडे खाओ, ड्यूटी करो

एक फिल्म देखी थी, पुलिस वाला गुंडा । आईपीएस अफसर के गिरफ्तारी के बाद जब मैंने कुछ लिखना चाहा तो, पुलिस वाला गुंडा फिल्म के दृश्य आंखों के सामने आ रहे थे । हालांकि फिल्म में पुलिस की गुंडई, बदमाशों को मारने के लिए दिखाई गई थी । लेकिन रील लाइफ और रीयल लाइफ में यही फरक है । रीयल लाइफ में पुलिस की गुंडई कहीं ज्यादा है । दुनिया के जितने के गलत काम होते हैं, पुलिस करती है, करवाती है । चाहे जुआघर हो, कैसीनो हो, वेश्याओं के कोठे हों, नशीले दवाइयों का व्यापार हो, किसी का कत्ल हो । ऐसा नहीं कि सभी पुलिस वाले गलत धंधे में लिप्त हैं, लेकिन ऐसा भी नहीं कि गलत धंधे बिना पुलिस की रजामंदी से नहीं हो रहे हैं । मुंबई में पुलिस ने ही एक बड़े पुलिस अधिकारी को दबोच कर यह साबित किया है, कि समाज के हर तबके में चोर हैं । फिर चाहे पुलिस, नेता और आम लोगों को समाज क्यों न हो ? यहां तक कि चौथा स्तंभ भी इसमें शुमार हो गया है । किसे सही कहा जाए?मुंबई में भारी मात्रा में ड्रग्स के साथ आईपीएस अफसर शाजी मोहन 93 बैच का आईपीएस है। जम्मू कश्मीर कैडर के इस अधिकारी के पास से ११ किलो ड्रग्स बरामद किए गए हैं । मुंबई एटीएस ने गिरफ्तार किया है। इससे पहले ये अधिकारी चंडीगढ़ में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो में तैनात था। पंजाब और हरियाणा में तो नशीले पदाथॆ की खेप रोज पकड़ी जाती है । पंजाब से सबसे ज्यादा खेप राजस्थान से चल कर आती है । जिसमें सफेदपोश के साथ-साथ खाकीधारी भी शामिल हैं । राजस्थान और पंजाब राज्य पाकिस्तान से भी सटा है । आए दिन नशीले पदाथो की खेप पकड़ी जा रही है । हैरोइन, चरस, अफीम और पता नहीं क्या-क्या ? सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पुलिस को यह नहीं पता । रात होते ही चौराहों, गलियों और सड़कों पर घूमने वाली पुलिस खुद नशे की तलाश में रहती है । पंजाब में तो यह आम है, डोडे खाओ, ड्यूटी करो । फिर चाहे सीएम की ड्यूटी में क्यों न लगे हों ।

राष्ट्रवादी रहमान













राष्ट्रवादी मिलियनेयर भारतीय फिल्म को बहुप्रतिष्ठत हालीवुड पुरुस्कार 'गोल्डन ग्लोब अवार्ड ' भले ही सर्वश्रेष्ठ सक्रीन प्ले,निर्देशन तथा संगीत के संयुक्त आधार पर मिला हो लेकिन संगीतकार ए.आर.रहमान को मिले इस पुरुस्कार में भारतीयता की जीत है । संवैधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के बावजूद जब देश में सबकुछ धर्म -जाति और क्षेत्र के आधार पर बांटा जा रहा हो, एसे में रहमान की इस उपलब्धि को राष्ट्र के नाम समर्पित करना कइयों के लिए सबक या प्रेरणास्रोत बन जाना चाहिए । गौर है कि उक्त फिल्म का गुलजार लिखित रहमान का संगीतबद्ध गीत 'जय हो' गाना सर्वश्रेष्ठ मौलिक संगीत रचना के खिताब से नवाजा गया है । निश्चित रूप से रहमान का रचा यह इतिहास उनके भारतीयता में डूब जाने या राष्ट्रयिता से ओत-प्रोत हो जाने का ही परिणाम है । इस दृष्टि से अल्लाह रखा रहमान 'गोल्डन ग्लोब अवार्ड ' जीतने वाले पहले भारतीए हैं । संगीत की रचना के समय भी भारतीयता की कल्पना में खोए रहने वाले रहमान की रचनाएं उनके समर्पण को कई बार प्रकट कर चुकी है । संगीत के इस साधक में भारतीयता को समझने, भारतीयता में डूबने का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि वह अपने संगीत के लिए कभी छत्तीसगढ़ को जानना चाहते हैं तो कभी गुजरात के गांवों को । कभी वह कश्मीर की वादियों में गुनगुनाया है तो कभी त्रिपुरा की तराइयों में उसकी कल्पनी पहुंची । जय हो रहमान, जय हो हिंद ....

‘सुभाष की सेना’ पर लगे थे आरोप!


देश की आजादी के लिए अपने-अपने तरीके से प्रयास करने की मुहिम में आजाद हिंद फौज (आईएनए) के संस्थापक सुभाष चंद्र बोस के योगदान को किसी भी कीमत पर कम करके नहीं आंका जा सकता, लेकिन उनके फौजियों को मलाल है कि आजाद भारत की पहली सरकार भी उनके साथ न्याय न कर सकी और देश के पहले सेनाध्यक्ष जनरल करियप्पा की नजर में तो ये फौजी अनुशासनहीन भी थे।आईएनए की अग्रिम पंक्ति के नायक रहे और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना से विद्रोह करने के आरोप में कोर्ट मार्शल झेलने के बाद फांसी की सजा सुनाए गए कैप्टन अब्बास अली ने अपनी किताब में यह खुलासा किया है।आजादी के बाद देश में समाजवादी आंदोलन से जुड़ने वाले कैप्टन अब्बास ने अपनी आत्मकथा ‘न रहूं किसी का दस्तनिगर’ में 1945 में पंडित नेहरू के नेतृत्व में बनी पहली अंतरिम सरकार द्वारा आईएनए के फौजियों के साथ किए गए बर्ताव का बेबाकी से वर्णन किया है।आजादी के बाद जनता पार्टी के सदस्य के रूप में उत्तरप्रदेश में विधान परिषद के सदस्य रहे कैप्टन अली लिखते हैं कि विश्वयुद्ध में आईएनए के सिपाहियों को ब्रिटिश सरकार से बगावत कर जापान का साथ देने के आरोप में कोर्ट मार्शल के दौरान फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद, 1946 में बनी अंतरिम सरकार ने अधिकांश सैनिकों की सजा को मुल्तवी कर दिया। लेकिन कुछ एक सिपाहियों को ब्रिटिश अधिकारियों ने फिर भी सजा-ए-मौत दे दी और भारत सरकार कुछ न कर सकी। इतना ही नहीं कोर्ट मार्शल की कार्रवाई के दौरान भी उन लोगों के साथ जेलों में बुरा बर्ताव किया गया।कैप्टन अली के मुताबिक, “देश की आजादी के लिए आईएनए में भर्ती हुए सैनिकों को उम्मीद थी कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन सभी को भारतीय सेना में शामिल कर देश की सेवा का मौका दिया जाएगा। लेकिन हाय री किस्मत, हमारी अपनी सरकार ने ही हमारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया और वह भी नाकाबिल बताकर”। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि आईएनए में एक लाख से ज्यादा सैनिक थे और इनमें से 60 हजार से अधिक पहले ब्रिटिश फौज का हिस्सा थे।आमतौर पर माना जाता है कि आईएनए के केवल तीन युद्धबंदियों- जनरल शाहनवाज खां, कैप्टन सहगल और कैप्टन ढिल्लों को ही कोर्ट मार्शल का दंश झेलना पड़ा, जबकि सच्चाई यह है कि ऐसे हजारों सिपाहियों के खिलाफ देश की विभिन्न जेलों में यह कारवाई हुई और वह भी उनमें से एक थे।कैप्टन अली ने बयां किया, “बड़े अफसोस के साथ मुझे लिखना पड़ रहा है कि हम बागियों को यह कहकर आजाद भारत की सेना में शुमार नहीं किया गया कि ये फौजी अनुशासित नहीं हैं। मुझे याद पड़ता है कि देश के पहले सेनाध्यक्ष जनरल करियप्पा ने बयान दिया था कि चूंकि आईएनए के सिपाही अनुशासित नहीं हैं, इसलिए उन्हें दोबारा सेना में शामिल नहीं किया जाएगा और हमारी सरकार ने उनकी यह बात मान ली”। कैप्टन अली के मुताबिक इससे भी ज्यादा अफसोसजनक बात यह रही कि आईएनए के जनरल शाहनवाज खां ने, जो आजादी के बाद कांग्रेस में शामिल हुए और केन्द्र में मंत्री भी बने, अपने ही साथियों के साथ किए गए इस अपमानजनक रवैये के बारे में कुछ नहीं किया। इसके लिए सिर्फ डॉ. राममनोहर लोहिया ही बार-बार आवाज उठाते रहे।उन्होंने लिखा कि आजादी के बाद आईएनए के सैनिकों को भारतीय सेना में शामिल करने या न करने का सवाल उठाना ही निरर्थक था।खैर, अगर यह सवाल उठाया भी गया तो फिर उन्हें बगावती बताकर सेना में शामिल करने से अयोग्य ठहराए जाते वक्त यह सवाल क्यों नहीं उठाया गया कि देश की आजादी के इन दीवानों ने आखिरकार बगावत किसके खिलाफ की थी। अपने देश के खिलाफ या फिर देश के दुश्मनों के खिलाफ।कैप्टन अली लिखते हैं कि एक सैनिक के लिए उसके फौजी होने से अयोग्य बताने से बड़ी पीड़ा और कुछ नहीं हो सकती और इस पीड़ा का अंत यहीं नहीं हुआ, बल्कि कांग्रेसी सरकार ने इन सिपाहियों और अफसरों को 1972 तक न तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माना और न ही किसी तरह की पेंशन या कोई सुख सुविधा दी। विपक्षी दलों के संसद से सड़कों तक पर्याप्त शोरगुल और जद्दोजेहद के बाद 1972 में इंदिरा गांधी की सरकार ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी माना और पेंशन दी। लेकिन इस समय तक तमाम सिपाही मर चुके थे और जो बचे थे उन्हें सरकार ने दस्तावेजी सबूतों के अभाव में आईएनए का सिपाही ही नहीं माना। कुल मिलाकर स्थिति ज्यों की त्यों रही । - वार्ता

यह कैसी श्रद्धांजलि ?






















मुंबई में आतंकी हमले को एक माह पूरा भी नही हुआ की जालंधर (पंजाब) में सत्ताधारी नेताओं और बड़ी हस्तियों ने नए साल के पहले ही पार्टी का जमकर लुत्फ़ उठाया । इन लोगों ने आंतकी हमलों में शहीद हुए शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक दिन पहले नया साल न मनाने का nirday लिया था । इस पार्टी को मुख्यमंत्री के करीबी रहे लोगों ने आयोजित की । जिसमें मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के करीबी और बडे पद पर काम कर रहे नेता की पत्नी ने तो कमाल ही कर दिया । जुल्फे झटकीं, युवा पार्टनर के साथ खूब थिरकीं । पंजाब पुलिस के डीएसपी भी दारू की गिलास के साथ ठुमके लगाए । क्या खूब दी है शहीदों की श्रद्धांजलि...

ब्रिटिश फौज की वर्दी और गांधी


गांधी के ब्रिटिश फौज की वर्दी पहनने के तथ्य का विवाद के रूप में तूल पकड़ना देख रक्षा मंत्रालय बचाव की मुद्रा में आ गया है और उसने अब प्रस्तावित ‘शताब्दी सैनिक समाचार स्मारिका’ में आवश्यक फेरबदल की प्रक्रिया शुरू कर दी है।रक्षा सूत्रों के अनुसार रक्षा मंत्रालय की पत्रिका के 2 जनवरी 2009 को 100 साल पूरे होने के मौके पर प्रकाशित की जा रही इस स्मारिका में गांधी जी के ब्रिटिश फौज में शामिल होने संबंधी समाचार को संक्षिप्त और सम्पादित किया जा रहा है और उसमें तमाम अतिश्योक्तियों को अंतिम समय में हटाया जा रहा है।रक्षा सूत्रों ने कहा कि इस पूरे प्रकरण को विवाद के तौर पर पेश करना गैर जरूरी है क्योंकि स्वयं महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा ‘माई एक्सपीरियेंस विद ट्रुथ’ में विस्तार से इस बात का जिक्र किया है कि किन परिस्थितियों में उन्होंने ब्रिटिश फौज की वर्दी पहनी थी और वर्ष 1889 के समय बोअर की लड़ाई में उन्होंने किस तरह पहल करते हुए एम्बुलेंस यूनिट गठित की थी।रक्षा प्रवक्ता सितांशु कार से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने सवाल को टालते हुए कहा, “आप 2 जनवरी 2009 तक का इंतजार करिये जब सैनिक समाचार की शताब्दी स्मारिका का लोकार्पण किया जाएगा। इस अंक के लिए हमारी एक मजबूत सम्पादकीय टीम है जो सभी विषयों के साथ उचित न्याय कर रही है और इतिहास के तथ्यों को जस का तस पेश करने में यह टीम पूरी तरह सक्षम है”।इस बारे में कार ने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया कि मामले के विवाद के रूप में पेश किए जाने के बाद मूल लेख को बदला जा रहा है या नहीं।‘यूनीवार्ता’ ने सैनिक समाचार की इस स्मारिका की अग्रिम प्रति के आधार पर इतिहास के इस बेहद अनजाने तथ्य को पेश किया था कि गांधी जी भी ब्रिटिश फौज में शामिल हुए थे और उन्होंने ब्रिटिश फौज की वर्दी भी पहनी थी। स्मारिका में गांधी जी का फौजी वर्दी वाला चित्र भी प्रकाशित हो रहा है जिसे हटाए जाने की योजना नहीं है।रक्षा सूत्रों ने कहा कि स्मारिका में जो कुछ प्रकाशित हो रहा है उसमें कुछ भी नया नहीं है और इसमें 2 जनवरी 1909 से लेकर आज तक के सैनिक समाचार और फौजी अखबार के लेखों का संकलन ही है। गांधी जी के बारे में जिस चर्चित लेख ने बहस का रूप लिया है वह तीन दशक से अधिक पहले प्रकाशित हुआ था।रक्षा सूत्रों के अनुसार स्मारिका की सम्पादकीय टीम इतिहासकारों की राय ले रही है और लेख को इस तरह सम्पादित किया जा रहा है कि गांधीवादियों की भावना को कोई ठेस न पहुंचे । - मुकेश कौशिक

आखिर कब तक उडेंगे इंसानी चिथड़े ?


एक बार फिर पाकिस्तान को आतंकवादी देश ठहराने वाले ठोस सबूतों के साथ सरकार चिंघाड़ रही है, लेकिन अमेरिका तमाशबीन बना हुआ है । एक हद तक कूटनीति सही है लेकिन कब तक ? एसा लगता है की हम कुछ दिन बाद सब भूल जाते हैं,नेता कुछ एसा ही सोचते होंगे । पाकिस्तान के खिलाफ १५ ठोस सबूत है , भारत कूटनीति का सहारा ले रहा है । अगर यही हमला अमेरिका पर हुआ होता तो पाकिस्तान को दूसरा अफगानिस्तान बनते देर न लगता । तालिबान को ध्वस्त करने वाला अमेरिका सयंम बरतने को कह रहा है । ठीक है सयंम में रहना चाहिए, लेकिन कब तक ?

लोगों की लाशों की परवाह किए हम पाकिस्तान के साथ तू तू मैं मैं की राजनीति में लगे हुए हैं । चाहे वो सरकार हो, चाहे वो मीडिया हो या चाहे जो भी जिम्मेदार लोग हों, हर कोई युद्ध और युद्ध की राजनीति की बातें कर रहा है। सवाल ये है कि खुद को बचाने के लिए हम क्या कर रहे हैं? हम अपने आपको सुरक्षित रख पाएं, अपने लोगों पर आंच न आने पाए,इसका कोई उपाय करें, उससे ज्यादा जरुरी कई नेताओं को ये लग रहा है कि वो कैसे टीवी चैनलों पर जाकर बहस में हिस्सा लें। और ये बता पाएं कि कैसे उसकी पार्टी या उनकी सरकार का इससे कोई लेना देना नहीं है ।

यह ठीक है की युद्ध किसी मामले का हल नही है, लेकिन आतंकवाद को ख़तम करने के लिए क्या हो रहा है । अगर पाक में आतंकी ट्रेनिंग कैम्प हैं तो उसे पर कार्यवाई कब तक होगी ? ऐसे कई सवाल उठते रहेंगे, जब तक आतंक का समूल सफाया नही हो जाता है । और यह कब तक होगा नही पता ? बेगुनाह जनता के चिथड़े उड़ते रहेंगे, राजनीति होती रहेगी ।

कचेहरी और अदालत को ले जाएं 'थानेदार'


माइक से बार-बार आवाज गूंज रही थी कि थानेदार सिंह की अम्मा कचेहरी देवी और बप्पा अदालत सिंह गायब हो गए हैं । थानेदार जहां कहीं भी हों, आकर पूछताछ केंद्र से कचेहरी और अदालत को ले जाएं । कचेहरी बार-बार बेहोश हो रही है, अदालत का बुरा हाल है । छोटकू के अम्मा भी मेले में भटक गई हैं, छोटकू के साथ । अम्मा ना तो अपना नाम बता रही है और अपने मरद का नाम भी नहीं बता रही हैं, हां यही कह रहीं है कि छोटकू के बप्पा कह कर गोहराओ, दौड़ते चले आएंगे । मुनव्वर की मुन्नी देवी भी बड़का मंदिर के पास भटक गई हैं, रो रहीं हैं, किसी ने खोआ-पाया दफ्तर तक पहुंचा दिया है । मुन्नी देवी को मुनव्वर ले जाओ, इन्हें बेहोश होने वाला दौरा पड़ रहा है । यह सीन है एक मेले की, जहां मैं भी पहुंचा हुआ था....खोया-पाया दफ्तर के सामने अजब-गजब एनाऊंसमैंट सुन कर प्रसन्न हो रहा था । इस अजब-गजब के आगे राजू भैया श्रीवास्तव की मसखरी फेल हो रही थी । .... तभी हटो-हटो....बड़ी-बड़ी मूंछों पर हाथ फेरते हुए एक भारी-भरकम इंसान भीड़ को चीरते हुए चिल्ला रहा था... हाय कचेहरी मैया तू कहां चली गइव रहा । अदालत बप्पा भी तोहरे साथे ही हैं । बुढऊ से कहिन रहा कि टैंट में रहौ, पर मानिन नाहीं । अपनौं हेराय गे अऊर साथेम मैय्यक भी हेरवाय दिहिन ।सगरौ मजा फ्यूज कइ दिहिन । अरे थानेदार भैया का भवा । काहे परेशान हौ, मैया और बप्पा मिल गइन । अब का दिक्कत है॥चलौ मेलवम थोरय घूम आवा जाए । का खाक चले बड़कऊ तीन घंटा तो खोजइम लगाइ दीन, अब का होई, अब तौ चलेन का टाइम होइ गवा है भैया । छोटकू के अम्मा छटपटाइ रहीं हैं, अब तक छोटकू के बप्पा नाहीं आए । छोटकू पछाड़े मार कई रोवत बाटय । छोटकू के अम्मा फिर से एनाऊंसमैंट वाले से छोटकू के बप्पा को पुकारे के लिए कहती है । एनाऊसमैंट करने वाला कहता है, का माई बार-बार पुकार रहिन है, ना तौ तू आपन नमवा बतावत हिव और ना ही छोटकू के बप्पा कय । तभी मुन्नी देवी चिल्ला पड़ती है ... अरे वह जात हैं मुनव्वर, हे चिल्लम का बप्पा, हम यहां हन । मुन्नवर बोला, हाथ पकर कइ चलइ कहा रहा, हाथ काहै छोडि दिहिस रहा । हम तो हाथय पकड़ कर रखेन रहा ... लेकिन तुमही गायब होइ गइव तो हम का करी । हाथ देखन तो कोही अऊर कैय रहा ? मेरी ट्रेन छूटने में अभी एक घंटे का समय था, स्टेशन जाते-जाते आधे घंटे लग जाते । मैंने आधा घंटा रह कर छोटकऊ के बप्पा की एंट्री का इंतजार करना चाह रहा था । हालांकि इस बीच कई और अजब-गजब नामों का उच्चारण हो रहा था । गायब होने की सूची में कई नाम शामिल हो चुके थे । लेकिन मुझे कचेहरी, अदालत, छोटकऊ के अम्मा (मम्मी)और मुन्नवर की मुन्नी में था । हालांकि कचेहरी और अदालत को थानेदार ले जा चुका था, मुन्नी भी अपने मरद मुनव्वर के साथ जा चुकी थी । लेकिन छोटकऊ और उसकी अम्मा में मेरी दिलचस्पी बनी हुई थी...लेकिन छोटकऊ के बप्पा (डैड) अभी तक खोया-पाया सैंटर नहीं आए थे, इस बीच मेरे दोस्त ने कहा,चलो टऒेन छूट जाएगी ।

क्या भारतीय टीवी चैनल ऎसा नहीं कर सकते?

बात उस समय की है, जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी एक आत्मघाती हमले में मारे गए थे। प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रिका “ टाइम” ने उस हादसे की तस्वीर प्रकाशित नहीं की। लेकिन अपने इस फैसले के बारे में एक संपादकीय जरूर प्रकाशित किया।
“टाइम” ने लिखा, बावजूद इसके, कि यह हादसा दुनिया पर असर डालने वाली घटनाओं में से एक था, बावजूद इसके, कि राजीव गांधी विश्व के एक प्रमुख नेता थे, उन्होंने संपादकीय मंडल के विचार-विमर्श के बाद उनकी मृत्यु की तस्वीर प्रकाशित नहीं करने का फैसला किया।
“टाइम” के संपादकीय में लिखा गया था, कि “वे तस्वीरें प्रकाशित नहीं करने का फैसला इसलिए किया गया कि मौत ने उन्हें वह गरिमा नहीं बख्शी जिसके वह हकदार थे। हम वे तस्वीरें नहीं प्रकाशित कर उनकी गरिमा की रक्षा करना चाहते थे।“
यह बात हम भारतीय समाचार टीवी चैनलों को याद दिला कर एक अनुरोध करना चाहते हैं, कम से कम लाशों की तसवीरें तो प्रसारित नहीं करिए।
बम विस्फोट हो, या चामुंडा मंदिर में भगदड़, या लखनऊ फ्लाईओवर के धंसने से उसके नीचे दबे मृत शरीर- उनकी तस्वीरें दिखा कर क्या आप किसी मृतक की गरिमा का अनादर नहीं कर रहे? क्या उनके शोकग्रस्त परिवारों के प्रति आप यत्र- तत्र बुरी हालत में पड़ी लाशों की तस्वीरें टीवी पर दिखा कर उस हादसे से भी ज्यादा क्रूरता नहीं बरतते?
कितने ही अखबारों ने भोपाल गैस कांड के बाद लाशों की वीभत्स तस्वीरें छपने से परहेज किया था। तस्वीरें छपीं जरूर, लेकिन प्रतीकात्मक।
हादसों की रिपोर्टिंग करते समय क्या टीवी चैनलों पर भी पत्रकारिता की इस गरिमामय परंपरा का पालन नहीं किया जा सकता? - साभार : जोश -गरम चाय

सीमाओं में रहे, मुंबई की ये मनसे .....

मन से यदि हम चाहते, देश रहे खुशहाल ।

मिलकर रहना सीख लें, सब भारत के लाल ।

सब भारत के लाल, बिहारी हों कि मराठी ।

लेकिन भाई पर भाई बरसाता लाठी ।

चक्र सुदर्शन टूट रहा है, इस अनबन से ।

सीमाओं में रहे, मुंबई की ये मनसे .....

अशोक चक्रधर

बडे भाई निशीथ जोशी की कलम से


स्वर्गीय आपा और लाला भाई (मो माबूद ) के नाम जिनके बिना ये बेटा इतना बड़ा नहीं हो सकता था। आपकी बहुत यद् आती है। इंशा अल्लाह कभी तो मुलाकात होगी। वैसे तो आप हरदम मेरे साथ हो। कभी तहजीब के रूप में तो कभी दुआओं के ताबीज के रूप में। सिर्फ़ यही है मेरी जिंदगी की कमाई -------निशीथ
खौफ ------
रोक लो इन हवाओं को
मत आने दो शहर से
मेरे गांव की ओर
वरना मंगल मामा
हिंदू हो जाएगा
और रहमत चाचा
मुसलमान हो जाएगा
और रहमत चाचा मुसलमान.....

मालेगांव की ‍आग पहुंची उत्तर प्रदेश

मालेगांव बम धमाके की आग अब उत्तर प्रदेश में सुलगने लगी है । गोरखपुर एक बार फिर सुर्खियों में है । इस बार साध्वी प्रज्ञा को लेकर गोऱखपुर का नाम सामने आया है । गोरखपुर के विधायक पर साध्वी के तार जुड़े होने के आरोप है । गोरखपुर के सांसद और पूर्वी उत्तर प्रदेश के हिंदू नेता योगी आदित्य नाथ भी घेरे में है । यह वही योगी है,जिन पर यूपी की पुलिस ने एक बार हाथ डालने की कोशिश की थी, तब गोरखपुर समेत पूरे उत्तर प्रदेश में बवाल खड़ा हो गया था । गोरखपुर में आगजनी हुई दंगा हुआ । सब राजनीति से प्रेरित है ।

पहले खादी से तो अब भगवा से राजनीति

एक जमाना था जब खादी से देश की राजनीति संचालित होती थी, लेकिन समय बदल गया है । देश की राजनीति खादी नहीं भगवा से चल रही है । भगवा है ठीक है, लेकिन भगवा की आड़ में चंद राजनेता गंदी राजनीति कर रहे हैं । हो सकता है साध्वी भी इसी गंदी राजनीति का शिकार बनी हो, लेकिन जांच तो होनी ही चाहिए ।

बहुत कुछ छिपा है बीहड़ों में

मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की बीच पड़ते बीहड़ों में वह बहुत कुछ सच्चाई छिपी है, जो एटीएस को तलाश है । चंबल की घाटी में हर वह सुराग मिल सकता है, जो एटीएस को शायद उत्तर प्रदेश के तराई इलाके से नहीं मिल सकती है । मालेगांव ब्लास्ट के तार उत्तरप्रदेश से होते हुए जम्मू-कश्मीर तक पहुंच गए हैं। मुंबई एटीएस ने बुधवार को कानपुर से एक शख्स को हिरासत में लिया है। उस शख्स का नाम दयानंद पांडे बताया जाता है और एटीएस को उसके वीएचपी से जुड़े होने की आशंका है। दयानंद को लेकर एटीएस लखनऊ रवाना हो गई। लखनऊ लाकर उससे मालेगांव ब्लास्ट मामले में पूछताछ की गई।एटीएस ने सोमवार को मुंबई की अदालत में एक अर्जी दाखिल कर एक प्रमुख हिंदू नेता से पूछताछ करने की इजाजत मांगी है तथा इस संबंध में उत्तरप्रदेश सरकार से सहयोग दिलाने की बात कही है। एटीएस ने फरुखाबाद और पूर्वी उत्तरप्रदेश में गुपचुप अभियान चलाकर मालेगांव विस्फोटों के लिए ठोस सबूत जुटाए हैं।भाजपा उत्तरप्रदेश से पार्टी के सांसद आदित्यनाथ का खुलकर बचाव में उतर आई है । आदित्यनाथ ने मालेगांव विस्फोट में उनका हाथ होने के बारे लगाई जा रही अटकलबाजियों के बाद मंगलवार को एटीएस को उन्हें गिरफ्तार करने की चुनौती दी थी।


चुनौती छोड़ कर जांच में सहयोग करे नेता
अगर साध्वी सही है, योगी आदित्यनाथ सही है, दयानंद पांडेय ने कोई गलत काम नहीं किया है तो भाजपा और संघ एटीएस को चुनौती क्यों दे रही है ? सभी राजनीतिक दलों को एक होकर इसके लिए अपेन स्तर पर एक जांच कमेटी तैयार कर मामले की सही जांच करना चाहिए । पुलिस और कानून को चुनौती देकर आखिर हमारे राजनेता साबित क्या करना चाह रहे हैं । मामले को राजनीतिक तूल दिया जा रहा है, जो देश के घातक है ।

देह दर्शन या ड्रग्स को बढ़ावा


मधुर भंडारकर की फिल्म ‍'फैशन' में भारतीय फिल्म की नायिकाओं ने सभी पराकाष्ठा पार कर दी है । देह दर्शन के अलावा धूम्रपान 'फैशन' का सबसे बड़ा नकारात्मक हिस्सा है । फिल्म की नायिका कंगना राणावत और प्रिंयका चोपड़ा जिस तरह खुलेआम सिगरेट के धुंए के छल्ले उडाती नजर आईं, तो उससे भी कहीं ज्यादा बोल्ड शराब पीने की सीन रही है । अधनंगे बदन के साथ सिगरेट और शराब की मस्ती वाली 'फैशन' समाज को क्या संदेश देना चाह रही है, यह फिल्म देखने वाले भी नहीं बता सके । 'डा‍न' फिल्म में हीरो शाहरुख खान ने सिगरेट के धुंए उड़ाने पर जब बवाल खड़ा हो सकता है, तो फैशन की दारू और सिगरेट सैंसर बोर्ड को क्यों नजर नहीं आए । फैशन में तो हद ही कर दी है, मिनट दर मिनट सिगरेट के कश हीरो और हीरोइन लगा रहे हैं, लेकिन किसी को परवाह नहीं है । फिल्म में कंगना राणावत को ड्रग्स लेते जैसे दिखाया है, क्या यह उचित है ? कंगना राणावत ही क्यों प्रिंयका चोपड़ा भी क्लब में ड्रग्स लेती हैं, उसके बाद अपना सबकुछ लुटा देती हैं (हालांकि चोपड़ा इससे पहले ही अपना सबकुछ लुटा चुका होती है)। फैशन में मुंबई की क्लबों को जिस तरह से दिखाया गया है, सही हो सकता है, लेकिन फिल्म में सिगरेट, शराब, स्मैक, नशीले इंजैक्शन लेते होरी और हीरोइन ने सभी मर्यादा लांघ कर लोगों को गलत संदेश दिया है ।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा सर्वजिनक स्थानों पर धूम्रपान पर पाबंदी लगाने के बाद उम्मीद जगी थी कि लोग सुधर जाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो सका । जब सिगरेट, शराब और अन्य तरह के नशीले ड्रग्स पर रोक है तो फैशन में इतनी मस्ती क्यों ? सैंसर बोर्ड सो कर फिल्में पास क्यों कर देता है । यही नहीं धूम्रपान पदार्थों के विज्ञापन पर भी रोक है, लेकिन फैशन में धूम्रपान पर रोक क्यों नहीं है ?

आखिर भगवा धारियों में उबाल क्यो ?


मालेगांव बम धमाके में साध्वी प्रज्ञा सिंह का नाम आने से 'भगवा' में आखिर उबाल क्यों हैं ? क्या सिर्फ़ मुसलमान ही आंतकी हो सकते हैं ? "भगवाधारी" का जब नाम आया तो सारे भगवाधारी नाराज हो गए । जब मुल्ला, मौलवी और मुसलमानों पर उंगली उठाई जा सकती है, तो हिंदू संगठनों में कुछ भगवाधारियों पर उंगली क्यों नहीं उठ सकती है । चलो कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि साध्वी प्रज्ञा का धमाके से कोई संबंध नहीं है, तो डर किस बात की है । साध्वी उमा भारती बिल्कुल ठीक कर रही हैं, लेकिन यह कोई प्रज्ञा का चरित्र प्रमाण पत्र नहीं है, जिसे ठीक समझा जाए । देश से जुड़ी हुई गंभीर बात है, जिस पर सभी दलों को एक होकर काम करना चाहिए । ऐसा नहीं कि देश में कुछ मुसिलम संगठन ही आंतकी गतिविधियों में संलिप्त हैं, हिंदू संगठनों के कुछ मठाधीश भी इस दायरे में आ रहे हैं । हालांकि कभी छात्र नेता रहीं प्रज्ञा का चंबल के आस-पास इलाके में प्रवचन करना लोगों को पच नहीं रहा है । मान लेते हैं कि प्रज्ञा निर्दोष है, तो जांच से घबराना कैसे ? बवाल पर उबाल फैलाने के लिए न्यूज चैनलों ने काम शुरू कर दिया है । कोई मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज को जोड़ रहा है तो कोई वरिष्ठ अफसर से मोहब्बत की बात कर रहा है । छात्र राजनीति के बाद साध्वी बनी प्रज्ञा में क्या बदलाव आया , जिससे उनका नाम आतंकी गतिविधियों से जुड़ गया ? इस पूरे मसले पर भगवाधारी ही नहीं तमाम हिंदू संगठनों को एक होकर गंभीरता से सोचना होगा । पूरे मामले को इमानदारी के साथ जांच होनी चाहिए ।

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